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गणेश विसर्जन क्यों होता है?-Why does Ganesh immersion happen?

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धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार  श्री वेद व्यास ने  गणेश चतुर्थी से महाभारत कथा श्री गणेश को लगातार 10 दिन तक सुनाई थी जिसे श्री गणेश जी ने अक्षरश: लिखा था।10दिन बाद जब वेद व्यास जी नेआंखें खोली तो पाया कि 10 दिन की अथक मेहनत के बाद गणेश जी का तापमान बहुत अधिक हो गया है। तुरंत वेद व्यास जी ने गणेश जी को निकट के कुंड में ले जाकर ठंडा किया था। इसलिए गणेश स्थापना कर चतुर्दशी को उनको शीतल किया जाता है।

साल में दो बार क्यों मानते है नवरात्रि ? why do celebrate navratri two times in year ?

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नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाने वाला इकलौता उत्सव है- एक नवरात्रि गर्मी की शुरुआत पर चैत्र में और दूसरा शीत की शुरुआत पर आश्विन माह में। गर्मी और जाड़े के मौसम में सौर-ऊर्जा हमें सबसे अधिक प्रभावित करती है। क्योंकि फसल पकने, वर्षा जल के लिए बादल संघनित होने, ठंड से राहत देने आदि जैसे जीवनोपयोगी कार्य इस दौरान संपन्न होते हैं। इसलिए पवित्र शक्तियों की आराधना करने के लिए यह समय सबसे अच्छा माना जाता है। प्रकृति में बदलाव के कारण हमारे तन-मन और मस्तिष्क में भी बदलाव आते हैं। इसलिए शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए हम उपवास रखकर शक्ति की पूजा करते हैं। एक बार इसे सत्य और धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है, वहीं दूसरी बार इसे भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

8 पौराणिक पात्र, जिन्हें अमृत का वरदान मिला है-8 mythological characters, who have got the blessing of nectar

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1. परशुराम (Parshuram) :  परशुराम   त्रेता युग  (रामायण काल) के एक मुनि थे। उन्हें  भगवान विष्णु  का छठा अवतार भी कहा जाता है। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि  विश्वामित्र  एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर  कैलाश गिरिश्रृंग  पर स्थित  भगवान शंकर  के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें  श्रीकृष्ण  का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्...

श्री राम के अलावा ये 4 से भी हार गए थे रावण-Apart from Shri Rama, he was also defeated by 4 Ravan

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  बालि से रावण की हार एक बार रावण बालि से युद्ध करने के लिए पहुंच गया था। बालि उस समय पूजा कर रहा था। रावण बार-बार बालि को ललकार रहा था, जिससे बालि की पूजा में बाधा उत्पन्न हो रही थी। जब रावण नहीं माना तो बालि ने उसे अपनी बाजू में दबा कर चार समुद्रों की परिक्रमा की थी। बालि बहुत शक्तिशाली था और इतनी तेज गति से चलता था कि रोज सुबह-सुबह ही चारों समुद्रों की परिक्रमा कर लेता था। इस प्रकार परिक्रमा करने के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता था। जब तक बालि ने परिक्रमा की और सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया तब तक रावण को अपने बाजू में दबाकर ही रखा था। रावण ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वह बालि की गिरफ्त से आजाद नहीं हो पाया। पूजा के बाद बालि ने रावण को छोड़ दिया था। सहस्त्रबाहु अर्जुन से रावण की हार सहस्त्रबाहु अर्जुन के एक हजार हाथ थे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा था। जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंचा तो सहस्त्रबाहु ने अपने हजार हाथों से नर्मदा नदी के बहाव को रोक दिया था। सहस्त्रबाहु ने नर्मदा का पानी इकट्ठा किया और पानी छोड़ दिया, जिससे रावण पूरी सेना के साथ ही नर्मदा में बह गया ...

भगवान गणेश को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाते?-Why not offer Tulsi to Lord Ganesha?

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धर्म ग्रंथो के अनुसार भगवान गणेश को भगवान  श्री कृष्ण का अवतार बताया गया है और भगवान श्री कृष्ण स्वयं भगवान विष्णु के अवतार है। लेकिन जो तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इतनी प्रिय की भगवान विष्णु के ही एक रूप शालिग्राम का विवाह तक तुलसी से होता है वही तुलसी भगवान गणेश को अप्रिय है, इतनी अप्रिय की भगवान गणेश के पूजन में इसका प्रयोग वर्जित है।  पर ऐसा क्यों है इसके सम्बन्ध में एक पौराणिक कथा है - एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पंहुची। गंगा तट पर देवी तुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में विलीन थे। शास्त्रों के अनुसार तपस्या में विलीन गणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनके कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था। तुलसी श्री गणेश के र...

कैसे पैदा हुआ नारियल?-How was Coconut Born?

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हिन्दू धर्म में नारियल का विशेष महत्तव है।  नारियल के बिना कोई भी धार्मिक कार्यक्रम संपन्न नहीं होता है। नारियल से जुडी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है जो जिसके अनुसार नारियल का इस धरती पर अवतरण ऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। आज हम आपको नारियल के जन्म से जुडी यही कहानी बता रहे है।   यह कहानी प्राचीन काल के एक राजा सत्यव्रत से जुड़ी है। सत्यव्रत एक प्रतापी राजा थे, जिनका ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास था। उनके पास सब कुछ था लेकिन उनके मन की एक इच्छा थी जिसे वे किसी भी रूप में पूरा करना चाहते थे। वे चाहते थे की वे किसी भी प्रकार से पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक जा सकें। स्वर्गलोक की सुंदरता उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती थी, किंतु वहां कैसे जाना है, यह सत्यव्रत नहीं जानते थे। एक बार ऋषि विश्वामित्र  तपस्या करने के लिए अपने घर से काफी दूर निकल गए थे और लम्बे समय से वापस नहीं आए थे। उनकी अनुपस्थिति में क्षेत्र में सूखा पड़ा गया और उनका परिवार भूखा-प्यासा भटक रहा था। तब राजा सत्यव्रत ने उनके परिवार की सहायता की और उनकी देख-रेख की जिम्मेदारी ली। जब ऋषि विश्वामित...

व्यावहारिक जीवन के दृष्टिकोण से शिव नंदी के इस मुद्रा के महत्व को जानें।-Know the importance of this mudra of Shiva Nandi from the perspective of practical life.

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नंदी का संदेश है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है, ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की नजर शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी नजर भी आत्मा की ओर हो। इस बात का सरल शब्दों में मतलब है है कि हर व्यक्ति को अपने मानसिक, व्यावहारिक और वाणी के गुण-दोषों की परख करते रहना चाहिए। मन में हमेशा मंगल और कल्याण करने वाले देवता शिव की भांति दूसरों के हित, परोपकार और भलाई का भाव रखना चाहिए। नंदी का इशारा यही होता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही आम भाषा में मन का साफ होना कहते हैं। इससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस तरह संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाता है।  इस तरह अब जब भी मंदिर में जाएं शिव के साथ नंदी की पूजा कर शिव के कल्याण भाव को मन में रखकर वापस आएं। इसे ही शिवतत्व को जीवन में उतारना कहा जाता है। 

क्यों भगवान विष्णु की नींद में शुभ कार्य रुक जाते हैं-Why the auspicious work stops in the sleep of Lord Vishnu

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हिन्दू धर्म में एकादशियों को अहम महत्व प्राप्त है। आमतौर पर लोग एकादशी को महज एक व्रत के रूप में ही देखते हैं लेकिन किसी एकादशी का महत्व इससे अधिक होता है। एकादशी का अर्थ, उससे जुड़ा इतिहास एवं विभिन्न मान्यताएं मिलकर इस दिन को एक त्यौहार का रूप प्रदान करती हैं। हिन्दू धर्म के मान्य कैलेंडर हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह की 11वीं चंद्रमा तिथि को एकादशी का दिन माना जाता है तथा हर एक माह में दो एकादशियां होती हैं। यह एकादशी सभी के लिए काफी शुभ मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि एकादशी का पूरा दिन ही शुभ मुहूर्त से बना होता है। अत: इस दिन किसी भी मंगल कार्य को करना शुभ माना गया है। लेकिन हरिशयनी एकादशी इन सभी एकादशियों से कुछ अलग है। यह एक ऐसी एकादशी है जिसके आने के बाद हिन्दू धर्म में सभी मंगल कार्यों पर रोक लग जाती है। लेकिन क्यों? हरिशयनी का महत्व भगवान विष्णु से जुड़ा है। इस शब्द में ‘हरि’ का संबंध विष्णुजी से है तथा ‘शयन’ का अर्थ है विश्राम करना या फिर निद्रा में जाना। एक मान्यतानुसार यह ऐसा दिन है जब भगवान विष्णु चार माह के लिए शयन अवस्था में चले जाते हैं। इन चार महीनों में भगवान व...

कार्तिक मास का महत्व, दीप दान क्यों?-Importance of Kartik month, why do lamp donation?

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हिंदू धर्म के धर्म शास्त्रों में प्रत्येक ऋतु व मास का अपना विशेष महत्व बताया गया है। सामान्य रूप से तुला राशि पर सूर्यनारायण के आते ही कार्तिक मास प्रारंभ हो जाता है। कार्तिक का माहात्म्य पद्मपुराण तथा स्कंदपुराण में बहुत विस्तार से उपलब्ध है। कार्तिक मास में स्त्रियां ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके राधा-दामोदर की पूजा करती हैं। कलियुग में कार्तिक मास व ्रत को मोक्ष के साधन के रूप में बताया गया है। कार्तिक में पूरे माह ब्रह्म मुहूर्त में किसी नदी, तालाब, नहर या पोखर में स्नान कर भगवान की पूजा की जाती है। धर्म ग्रंथों में कार्तिक मास के बारे में वर्णित है कि यह मास स्नान, तप व व्रत के लिए सर्वोत्तम है। इस माह में दान, स्नान, तुलसी पूजन तथा नारायन पूजन का अत्यधिक महत्व है| कार्तिक माह की विशेषता का वर्णन स्कन्द पुराण में भी दिया गया है| स्कन्द पुराण में लिखा है कि सभी मासों में कार्तिक मास, देवताओं में विष्णु भगवान, तीर्थों में नारायण तीर्थ (बद्रीनारायण) शुभ हैं| कलियुग में जो इनकी पूजा करेगा वह पुण्यों को प्राप्त करेगा| पदम पुराण के अनुसार कार्तिक मास धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष देने वाला...

क्या कारण था कि भगवान विष्णु ने राम का अवतार लिया?-What was the reason that Lord Vishnu took incarnation of Rama?

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पहला प्रसंग- जय-विजय को दिया था सनकादि मुनि ने श्राप एक बार सनकादि मुनि भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ आए। उस समय वैकुंठ के द्वार पर जय-विजय नाम के दो द्वारपाल पहरा दे रहे थे। जब सनकादि मुनि द्वार से होकर जाने लगे तो जय-विजय ने हंसी उड़ाते हुए उन्हें बेंत अड़ाकर रोक लिया। क्रोधित होकर सनकादि मुनि ने उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया। क्षमा मांगने पर सनकादि मुनि ने कहा कि तीनों ही जन्म में तुम्हारा अंत स्वयं भगवान श्रीहरि करेंगे। इस प्रकार तीन जन्मों के बाद तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। पहले जन्म में जय-विजय ने हिरण्यकशिपु व हिरण्याक्ष के रूप में जन्म लिया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का तथा नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। दूसरे जन्म में जय-विजय ने रावण व कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया। इनका वध करने के लिए भगवान विष्णु को राम अवतार लेना पड़ा। तीसरे जन्म में जय-विजय शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्मे। इस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण ने इनका वध किया। दूसरा प्रसंग- मनु-शतरूपा को भगवान विष्णु ने दिया था वरदान मनु और उनकी पत्नी शतरूप...

हम करवाचौथ पर छलनी से चंद्रमा को क्यों देखते हैं?-Why do we see the moon with a sieve on Karvachauth?

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करवाचौथ व्रत का नियम है कि विवाहित स्त्रियों को सोलह ऋंगार करके गौरी, गणेश और भगवान शिव सहित करवा माता की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत में करवा माता की कथा सुनना भी आवश्यक है। व्रत के नियम के अनुसार व्रती को पूरे दिन निर्जल व्रत रखना होता है। शाम में चांद को देखने के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है। किसी कारणवश पति के पास नहीं होने पर पति की तस्वीर को देखकर और उनका ध्यान करके भी व्रत खोला जाता है। लेकिन इस पूरे व्रत में छलनी का विशेष महत्व है। अमीर हो या गरीब हर वर्ग की महिलाएं इस व्रत में छलनी जरूर खरीदती हैं। शाम ढलने पर इसी छलनी की ओट से चांद देखकर व्रत पूरा होता है। करवाचौथ व्रत में छलनी का महत्व इसलिए है क्योंकि छलनी के कारण ही एक पतिव्रता स्त्री का व्रत टूटा था। करवाचौथ की कथा के अनुसार भावुकता में आकर भाईयों ने अपनी बहन को छल से चांद की जगह छलनी की ओट से दिया दिखाकर भोजन करवा दिया। झूठा चांद देखकर भोजन करने के कारण पतिव्रता स्त्री को अपना पति खोना पड़ा। इसके बाद पूरे वर्ष उस स्त्री ने चतुर्थी तिथि का व्रत रखा। पुनः करवाचौथ को छलनी से वास्तविक चांद देखने के बाद पत...

मंदिर में घंटी क्यों बजाई जाती है ?-why do ring a bell in temple?

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घंटियां 4 प्रकार की होती हैं : 1.  गरूड़ घंटी, 2. द्वार घंटी, 3. हाथ घंटी और 4. घंटा। 1. गरूड़ घंटी :  गरूड़ घंटी छोटी-सी होती है जिसे एक हाथ से बजाया जा सकता है। 2. द्वार घंटी :  यह द्वार पर लटकी होती है। यह बड़ी और छोटी दोनों ही आकार की होती है। 3. हाथ घंटी :  पीतल की ठोस एक गोल प्लेट की तरह होती है जिसको लकड़ी के एक गद्दे से ठोककर बजाते हैं। 4. घंटा :  यह बहुत बड़ा होता है। कम से कम 5 फुट लंबा और चौड़ा। इसको बजाने के बाद आवाज कई किलोमीटर तक चली जाती है। मंदिर में घंटी लगाए जाने के पीछे न सिर्फ धार्मिक कारण है बल्कि वैज्ञानिक कारण भी इनकी आवाज को आधार देते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है। इस कंपन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है। अत: जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज नियमित आती है वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इससे नकारात्मक शक्तियां हटती हैं। ...

आरती के समय मंदिर में शंख क्यों बजाते हैं?-Why do Shankha ring in the temple during Aarti?

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शंख का रहस्य। मंदिर में आरती के समय शंख बजते सभी ने सुना होगा परंतु शंख क्यों बजाते हैं? इसके पीछे क्या कारण है यह बहुत कम ही लोग जानते हैं। शंख बजाने के पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है और शंख बजाने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है। शंख की उत्पत्ति कैसे हुई ? इस संबंध में हिन्दू धर्म ग्रंथ कहते हैं सृष्टी आत्मा से, आत्मा आकाश से, आकाश वायु से, वायु अग्रि से, आग जल से और जल पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है और इन सभी तत्व से मिलकर शंख की उत्पत्ति मानी जाती है। शंख की पवित्रता और महत्व को देखते हुए हमारे यहां सुबह और शाम शंख बजाने की प्रथा शुरू की गई है। शंख बजाने का स्वास्थ्य लाभ यह है कि यदि कोई बोलने में असमर्थ है या उसे हकलेपन का दोष है तो शंख बजाने से ये दोष दूर होते हैं। शंख बजाने से कई तरह के फेफड़ों के रोग दूर होते हैं जैसे दमा, कास प्लीहा यकृत और इन्फ्लून्जा आदि रोगों में शंख ध्वनि फायदा पहुंचाती है। शंख के जल से शालीग्राम को स्नान कराएं और फिर उस जल को यदि गर्भवती स्त्री को पिलाया जाए तो पैदा होने वाला शिशु पूरी तरह स्वस्थ होता है। साथ ही बच्चा कभी...

भारतीय हिंदू नव वर्ष के बारे में जानकारी-Information about Indian Hindu New Year

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१ जनवरी को मनाया जाने वाला विश्वव्यापी इसाई नववर्ष पश्चिमी सभ्यता के कारण हमारे समाज के लोग बहुत ही धूम धाम से मानते हैं, क्योंकि समाज के लोगों को भारतीय हिंदू नववर्ष के विषय में जानकारी ही नहीं है । उसकी जानकारी मैं आप तक भेज रहा हूँ जिससे आपअपने मित्रों, सगे संबंधियों को मैसेज,फोन कॉल करके ये बता सकते हैं कि हम हिंदू नववर्ष क्यों मनाएं । आगामी २१ मार्च २०१५ को अपने हिंदू समाज का नववर्ष है आपसे निवेदन है की अपने मित्रों, सगे संबंधियों को मैसेज,फोन कॉल करके बधाई व शुभकामनायें दें । ऐसा आपसे हमारा आग्रह है ।   चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व : 1. चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा से एक अरब 97 करोड़ 39लाख 49 हजार 114 साल पहले इसी दिन को ब्रह्मा जी ने सृष्टि का सृजन किया था। 2. सम्राट विक्रमादित्य ने 2072 साल पहले इसी दिन राज्य स्थापित कर विक्रम संवत की शुरुआत की। 3. लंका में राक्षसों का संहार कर अयोध्या लौटे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का राज्याभिषेक इसी दिन किया गया। 4. शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दि...

ये 14 रत्न समुद्र मंथन से निकले थे-These 14 gems came out of the ocean churning

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1. कालकूट विष समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण कर लिया। इससे तात्पर्य है कि अमृत (परमात्मा) हर इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए।  2. कामधेनु समुद्र मंथन में दूसरे क्रम में निकली कामधेनु। वह अग्निहोत्र (यज्ञ) की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ग्रहण कर लिया। कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता की। क्योंकि विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है।  3. उच्चैश्रवा घोड़ा समुद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। इसका रंग सफेद था। इसे असुरों के राजा बलि ने अपने पास रख लिया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। मन की गति ही सबसे अधिक मानी गई है। यदि आपको अमृत (परमात्मा) चाहिए त...