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जब भगवान शिव को जलती लकड़ी से पीटा गया था-When Lord Shiva was beaten with burning wood

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देवों में देव महादेव की कोई जलती लकड़ी से पिटाई करे ऐसा कोई सोच भी नहीं सकता लेकिन, यह बात बिल्कुल सच है। बात कुछ 1360 ई. के आस-पास की है। उन दिनों बिहार के विस्फी गांव में एक कवि हुआ करते थे। कवि का नाम विद्यापति था। कवि होने के साथ-साथ विद्यापति भगवान शिव के अनन्य भक्त भी थे। इनकी भक्ति और रचनाओं से प्रसन्न होकर भगवान शिव को इनके घर नौकर बनकर रहने की इच्छा हुई।  भगवान शिव एक दिन एक जाहिल गंवार का वेष बनाकर विद्यापति के घर आ गये। विद्यापति को शिव जी ने अपना नाम उगना बताया। विद्यापति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी अतः उन्होंने उगना को नौकरी पर रखने से मना कर दिया। लेकिन शिव जी मानने वाले कहां थे। सिर्फ दो वक्त के भोजन पर नौकरी करने के लिए तैयार हो गये। इस पर विद्यापति की पत्नी ने विद्यापति से उगना को नौकरी पर रखने के लिए कहा। पत्नी की बात मानकर विद्यापति ने उगना को नौकरी पर रख लिया।  एक दिन उगना विद्यापति के साथ राजा के दरबार में जा रहे थे। तेज गर्मी के वजह से विद्यापति का गला सूखने लगा। लेकिन आस-पास जल का कोई स्रोत नहीं था। विद्यापति ने उगना से कहा कि कहीं से जल का प्रबंध करो...

भगवान कृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोढ़ी होने का श्राप क्यों दिया!-Why did Lord Krishna curse his own son to be a leper!

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आज हम आपको भगवान श्री कृष्ण और उनके पुत्र सांबा से सम्बंधित एक पौराणिक प्रसंग सुनाएंगे। इस कथा का सम्बन्ध पाकिस्तान के मुल्तान शहर में स्तिथ सूर्य मंदिर से भी जुड़ा है। भविष्य पुराण, स्कंद पुराण और वराह पुराण में इस बात का उल्लेख है कि श्री कृष्ण ने स्वयं अपने पुत्र सांबा को कोढ़ी होने का श्राप दिया था। इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए सांबा ने सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। जो की पाकिस्तान के मुलतान शहर में स्थित है। इस सूर्य मंदिर को आदित्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता था। लेकिन श्री कृष्ण ने ऐसा क्यों किया, आइये जानते है इसके पीछे की कहानी। भगवान श्री कृष्ण के आठ रानिया थी।  जिनमे से एक निषादराज जामवंत की पुत्री जामवंती थी। जामवंत उन गिने चुने पौराणिक पात्रो में से एक है जो रामायण और महाभारत दोनों काल में उपस्तिथ थे। ग्रंथों के अनुसार बहुमूल्य मणि हासिल करने के लिए  भगवान श्रीकृष्ण और जामवंत में 28 दिनों तक युद्ध चला था ।  युद्ध के दौरान जब जामवंत ने कृष्ण के स्वरूप को पहचान लिया तब उन्होंने मणि समेत अपनी पुत्री जामवंती का हाथ भी उन्हें सौंप दिया।  क...

हनुमान जी को क्यों चढ़ाते है सिंदूर का चोला ?-why we offer vermilion to hanuman?

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    रामचरित मानस के अनुसार जब राम जी लक्ष्मण और सीता सहित अयोध्या लौट आए तो एक दिन हनुमान जी माता सीता के कक्ष में पहुंचे। उन्होंने देखा कि माता सीता लाल रंग की कोई चीज मांग में सजा रही हैं। हनुमान जी ने उत्सुक हो माता सीता से पूछा यह क्या है जो आप मांग में सजा रही हैं। माता सीता ने कहा यह सौभाग्य का प्रतीक सिंदूर है। इसे मांग में सजाने से मुझे राम जी का स्नेह प्राप्त होता है और उनकी आयु लंबी होती है। यह सुन कर हनुमान जी से रहा न गया ओर उन्होंने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया तथा मन ही मन विचार करने लगे इससे तो मेरे प्रभु श्रीराम की आयु ओर लम्बी हो जाएगी ओर वह मुझे अति स्नेह भी करेंगे। सिंदूर लगे हनुमान जी प्रभु राम जी की सभा में चले गए।   राम जी ने जब हनुमान को इस रुप में देखा तो हैरान रह गए। राम जी ने हनुमान से पूरे शरीर में सिंदूर लेपन करने का कारण पूछा तो हनुमान जी ने साफ-साफ कह दिया कि इससे आप अमर हो जाएंगे और मुझे भी माता सीता की तरह आपका स्नेह मिलेगा। हनुमान जी की इस बात को सुनकर राम जी भाव विभोर हो गए और हनुमान जी को गले से लगा लिया। उस समय से ही हनुमान...

क्यों चढ़ाया जाता है शनि देव को तेल ?-why we should offer oil for Shani Dev?

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कथा इस प्रकार है शास्त्रों के अनुसार रामायण काल में एक समय शनि को अपने बल और पराक्रम पर घमंड हो गया था। उस काल में हनुमानजी के बल और पराक्रम की कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी। जब शनि को हनुमानजी के संबंध में जानकारी प्राप्त हुई तो शनि बजरंग बली से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। एक शांत स्थान पर हनुमानजी अपने स्वामी श्रीराम की भक्ति में लीन बैठे थे, तभी वहां शनिदेव आ गए और उन्होंने बजरंग बली को युद्ध के ललकारा। युद्ध की ललकार सुनकर हनुमानजी शनिदेव को समझाने का प्रयास किया, लेकिन शनि नहीं माने और युद्ध के लिए आमंत्रित करने लगे। अंत में हनुमानजी भी युद्ध के लिए तैयार हो गए। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ। हनुमानजी ने शनि को बुरी तरह परास्त कर दिया। युद्ध में हनुमानजी द्वारा किए गए प्रहारों से शनिदेव के पूरे शरीर में भयंकर पीड़ा हो रही थी। इस पीड़ा को दूर करने के लिए हनुमानजी ने शनि को तेल दिया। इस तेल को लगाते ही शनिदेव की समस्त पीड़ा दूर हो गई। तभी से शनिदेव को तेल अर्पित करने की परंपरा प्रारंभ हुई। शनिदेव पर जो भी व्यक्ति तेल अर्पित करता है, उसके जीवन की समस्त परेशानियां दूर हो जाती ह...

आखिर किस कारण राम ने लक्ष्मण को मृत्युदंड दिया? Why load Rama gave Capital punishment to Laxman?

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ये घटना उस वक़्त की है जब श्री राम लंका विजय करके अयोध्या लौट आते है और अयोध्या के राजा बन जाते है। एक दिन यम देवता कोई महत्तवपूर्ण चर्चा करने श्री राम के पास आते है। चर्चा प्रारम्भ करने से पूर्व वो भगवान राम से कहते है की आप जो भी प्रतिज्ञा करते हो उसे पूर्ण करते हो। मैं भी आपसे एक वचन मांगता हूं कि जब तक मेरे और आपके बीच वार्तालाप चले तो हमारे बीच कोई नहीं आएगा और जो आएगा, उसको आपको मृत्युदंड देना पड़ेगा। भगवान राम, यम को वचन दे देते है। राम, लक्ष्मण को यह कहते हुए द्वारपाल नियुक्त कर देते है की जब तक उनकी और यम की बात हो रही है वो किसी को भी अंदर न आने दे, अन्यथा उसे उन्हें मृत्युदंड देना पड़ेगा। लक्ष्मण भाई की आज्ञा मानकर द्वारपाल बनकर खड़े हो जाते है। लक्ष्मण को द्वारपाल बने कुछ ही समय बीतता है वहां पर ऋषि दुर्वासा का आगमन होता है। जब दुर्वासा ने लक्ष्मण से अपने आगमन के बारे में राम को जानकारी देने के लिये कहा तो लक्ष्मण ने विनम्रता के साथ मना कर दिया। इस पर दुर्वासा क्रोधित हो गये तथा उन्होने सम्पूर्ण अयोध्या को श्राप देने की बात कही। लक्ष्मण समझ गए कि ये एक विकट ...

रावण के पिछले जन्मो की कथा-Story of Ravana's past lives

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रावण अपने पूर्वजन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल हुआ करते थे पर एक श्राप के चलते उन्हें तीन जन्मो तक राक्षस कुल में जन्म लेना पड़ा था।  आज इस लेख में हम आपको रावण के दो पूर्वजन्मों और एक बाद के जन्म के बारे में बताएँगे। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु सनक, सनंदन आदि ऋषि बैकुंठ पधारे परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इंकार कर दिया। ऋषिगण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की व अपराध के लिए क्षमा माँगी। भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से क्षमा करने को कहा। तब ऋषियों ने अपने शाप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना पड़ेगा और उसके बाद तुम पुनः इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे। इसके साथ एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी-स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा। यह शाप राक्षसराज, लंकापति, दशानन रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के ये द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु राक्षसों के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष...

सावन के महीने में गंगा का पवित्र जल कावड़ में क्यों लाया जाता है?-Why is the holy water of the Ganges brought to Kavad in the month of Sawan?

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ये कथा उस समय की है जब माता सती ने शिव को पाने के लिए दूसरा जन्म पार्वती के रूप में लिया!. माता पार्वती ने शिव को पाने के लिए प्रेम और भक्ति का मार्ग़ अपनाया! एक समय माता पार्वती को देव ऋषि नारद ने अपने हाथो से मिटटी का शिवलिंग बनाने के लिए कहा  जब माता पार्वती ने मिटटी का शिवलिंग बनाया ! माता पार्वती ने शिवलिंग में जल चढ़ाने के लिए जल को मानसरोवर से लेकर आना उचित समझा, उस समय पृय्वी पर गंगा नदी नही बहती थी . तभी माता पार्वती के पिता हिमनरेश ने अपने धनुष के दोनों और मिटटी के बर्तन को बाधकर उनके के लिए कावड़ बनायीं. उस कावड़ में माता पार्वती शिव के लिए जल लेने चले गयी. तब शिव जी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक राजा का अवतार लिए और उन्हें रस्ते में मिले और कहा की तुम कहा जा रही हो. तभी माता पार्वती ने कहा में अपने स्वामी के स्नान के लिए मान सरोवर से पवित्र जल लेने जा रही हू. तभी राजा रूप में महादेव ने अपना ही अपमान किया और कहा की तुम्हारे स्वामी इतने अपवित्र है की उनको स्नान करने के लिए अपवित्र जल की जरुरत पढ़े , तभी माता पार्वती ने कहा की मेरे स्वामी तो बहुत पवित्र है मुझे ये भय है क़ि मेर...

किसके श्राप के कारण माता पार्वती अपने गर्भ से किसी बच्चे को जन्म नहीं दे पाईं?-Due to whose curse, mother Parvati could not give birth to any child from her womb?

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ये कथा उस समय की जब माता सती ने अग्नि कुण्ड में कूदकर प्राण त्याग दिए तब महादेव ने उनके जाने के बाद शक्ति पीठ की स्थापना करने के बाद अमरनाथ गुफा में समादि ले ली थी. जब माता सती से पार्वती के रूप में आई. और वह महादेव को समादि से बाहर लेकर आना चाहती थी. तभी देवराज इन्दर ने अपने स्वार्थ के कारण कामदेव और रति को महादेव की समादि तोड़ने के लिए आदेश दिया. इस से काम देव ने माता पार्वती से बोला की हमे देवराज इन्दर ने आप की सहायता के लिए भेजा है. काम देव ने महादेव  के  माथे पर धनुष चला  दिया  था. जिस से महादेव तपस्या (समाधि ) से बाहर आ गए , और वे क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी तीसरी आँख से कामदेव को भसम कर  दिया  . जिस से कामदेव की पत्नी रति ने देव राज को ये अभिशाप दे दिया की आपने जिस राजगद्दी को बचाने के लिए हमे भेजा था वे राजगद्दी कभी सुरक्षित नही रहेगी हमेशा आपको असुरो का भय सताता रहेगा. इस पर रति ने माता पार्वती को भी ये अभिशाप दे दिया की आप कभी अपनी कोख से किसी संतान को जन्म नही दे  सकेगी. ऐसा इस लिए अभिशाप दिया गया. क्यों उस समय तारकासुर ने देवतओं पर ह...

किस कारण महादेव ने ब्रम्हदेव जी का पाँचवा सिर काटा था ? -For which reason Mahadev had beheaded the fifth head of Brahma Dev?

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शिव की क्रोधाग्नि का विग्रह रूप कहे जाने वाले कालभैरव का अवतरण मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ। इनकी पूजा से घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता।  काल भैरव के प्राकट्य की निम्न कथा स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में है।   कथा काल भैरव की  कथा के अनुसार एक बार देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी से पूछा कि जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है तो स्वाभाविक ही उन्होंने अपने को श्रेष्ठ बताया। देवताओं ने वेदशास्त्रों से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है, अनादि अंनत और अविनाशी तो भगवान रूद्र ही हैं। वेद शास्त्रों से शिव के बारे में यह सब सुनकर ब्रह्मा ने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद दुखी हुए। इसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम 'रूद्र' रखा है अतः तुम मेरी सेवा में आ जाओ, ब्रह्मा के इस आचरण पर शिव को भयानक क्रोध आय...

किस कारण से ब्रह्मा, विष्णु और महादेव को 6 महीने का लड़का बनाना पड़ा? अनुसुइया के तीन बेटों की कहानी!-For which reason Brahma, Vishnu and Mahadev had to make a 6-month-old boy? Story of the three sons of Anusuiya!

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सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थी। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थी। एक दिन देव ऋषि नारद जी  बारी-बारी से विष्णुजी, शिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की बढ़ चढ़ के प्रशंसा की तथा कहाँ की समस्त सृष्टि में उससे बढ़ कर कोई पतिव्रता नहीं है। नारद जी की बाते सुनकर तीनो देवियाँ सोचने लगी की आखिर अनुसुइया के पतिव्रत धर्म में ऐसी क्या बात है जो उसकी चर्चा स्वर्गलोक तक हो रही है ? तीनो देवीयों को अनुसुइया से ईर्ष्या होने लगी। नारद जी के वहां से चले जाने के बाद सावित्री , लक्ष्मी तथा पार्वती एक जगह  इक्ट्ठी हुई तथा अनुसूईया के पतिव्रत धर्म को खंडित कराने के बारे में सोचने लगी। उन्होंने निश्चय किया की हम अपने पतियों को वहां भेज कर अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराएंगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जब अपने अपने स्थान पर पहुँचे तो तीनों देवियों ने उनसे अनु...

किस कारण से ऋषि गौतम ने अपनी पत्नी को पत्थर बनने का शाप दिया था?-For what reason did the sage Gautama curse his wife to become a stone?

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राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिलापुरी के वन उपवन आदि देखने के लिये निकले तो उन्होंने एक उपवन में एक निर्जन स्थान देखा। राम बोले, "भगवन्! यह स्थान देखने में तो आश्रम जैसा दिखाई देता है किन्तु क्या कारण है कि यहाँ कोई ऋषि या मुनि दिखाई नहीं देते?" विश्वामित्र जी ने बताया, यह स्थान कभी महर्षि गौतम का आश्रम था। वे अपनी पत्नी के साथ यहाँ रह कर तपस्या करते थे। एक दिन जब गौतम ऋषि आश्रम के बाहर गये हुये थे तो उनकी अनुपस्थिति में इन्द्र ने गौतम ऋषि के वेश में आकर अहिल्या से प्रणय याचना की। यद्यपि अहिल्या ने इन्द्र को पहचान लिया था तो भी यह विचार करके कि मैं इतनी सुन्दर हूँ कि देवराज इन्द्र स्वयं मुझ से प्रणय याचना कर रहे हैं, अपनी स्वीकृति दे दी। जब इन्द्र अपने लोक लौट रहे थे तभी अपने आश्रम को वापस आते हुये गौतम ऋषि की दृष्टि इन्द्र पर पड़ी जो उन्हीं का वेश धारण किये हुये था। वे सब कुछ समझ गये और उन्होंने इन्द्र को शाप दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को शाप दिया कि रे दुराचारिणी! तू हजारों वर्षों तक केवल हवा पीकर कष्ट उठाती हुई यहाँ राख में पड़ी रहे। जब राम इ...

पूजा करते समय सिर क्यों ढका जाता है?-Why is the head covered while worshiping?

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हमारी परंपरा में सिर को ढकना स्त्री और पुरुषों सबके लिए आवश्यक किया गया था। सभी धर्मों की स्त्रियां दुपट्टा या साड़ी के पल्लू से अपना सिर ढंककर रखती थी। इसीलिए मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर जाते समय या पूजा करते समय सिर ढकना जरूरी माना गया था। पहले सभी लोगों के सिर ढकने का वैज्ञानिक कारण था। दरअसल विज्ञान के अनुसार सिर मनुष्य के अंगों में सबसे संवेदनशील स्थान होता है। ब्रह्मरंध्र सिर के बीचों-बीच स्थित होता है। मौसम के मामूली से परिवर्तन के दुष्प्रभाव ब्रह्मरंध्र के भाग से शरीर के अन्य अंगों पर आते हैं। इसके अलावा आकाशीय विद्युतीय तरंगे खुले सिर वाले व्यक्तियों के भीतर प्रवेश कर क्रोध, सिर दर्द, आंखों में कमजोरी आदि रोगों को जन्म देती है। इसी कारण सिर और बालों को ढककर रखना हमारी परंपरा में शामिल था। इसके बाद धीरे-धीरे समाज की यह परंपरा बड़े लोगों को या भगवान को सम्मान देने का तरीका बन गई। साथ ही इसका एक कारण यह भी है कि सिर के मध्य में सहस्त्रारार चक्र होता है। पूजा के समय इसे ढककर रखने से मन एकाग्र बना रहता है। इसीलिए नग्न सिर भगवान के समक्ष जाना ठीक नहीं माना जाता है। यह मान्यता...

पूजा करते समय अगरबत्ती का इस्तेमाल क्यों नहीं करना चाहिए?-Why not use incense sticks while worshiping?

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बाँस को जलाना उचित नही माना जाता है, यहां तक कि जब हमारे हिन्दू धर्म में विवाह में भी बाँस का सामान बेटी के कन्यादान में दिया जाता है, जिसका अर्थ होता है कि बाँस अर्थात् ‘वंश’, जिससे बेटी जिस घर में जाए उस घर का वंश बढ़ता रहे। लेकिन लोग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बाँस की लकड़ियों से बनी अगरबत्ती का धड़ल्ले से उपयोग करते है, जो अनुचित है इसके बजाए गाय के गोबर में गूगल, घी, चन्दन, कपूर आदि मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बना कर सूखा कर उन्हें जलाना चाहिए। इससे वातावरण शुद्ध होता है। शास्त्रों में भी बाँस की लकड़ी को अनुचित बताते है। गौ माता के गोबर, गौमूत्र, घी, भीमसेनी कपूर, नीम से बनाई गौ शाला में निर्मित धूपबत्ती का ही प्रयोग सर्वोत्तम व स्वास्थ्य वर्द्धक है। 10 ग्राम घी जलाने से एक टन वायु शुद्ध होती है। पूजा अर्चना के लिए प्रयोग किए जाने वाली अगरबत्ती आपके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। अमेरिका के उत्तरी कैरोलिना विश्वविद्यालय के गिलिंग्स स्कूल ऑफ ग्लोबल हेल्थ ने एक अनुसन्धान में कहा है कि अगरबत्ती के धूएं से फेफड़ों को हानि पहुंच सकती है। इसलिए अगरबत्तियों से दूरी बनाने में...

जानिए हम धन तेरस क्यों मनाते हैं और यम के नाम पर दीपक क्यों जलाते हैं?

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दिवाली का त्योहार 5 दिनों का होता है, जो कि धन तेरस से शुरू होकर भाई दूज तक चलता है। पंचांग के अनुसार हर साल कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन धनवंतरि त्रयोदशी मनाई जाती है। जिसे आम बोलचाल में 'धन तेरस' कहा जाता है। यह दिन मूल रूप से आयुर्वेद के जनक माने जाने वाले धनवंतरी का पर्व है।   इस दिन नए बर्तन या सोना-चांदी खरीदने की परंपरा है। बर्तन खरीदने की शुरूआत कब और कैसे हुई। इसका कोई ठोस प्रमाण तो नहीं है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि जन्म के समय धनवंतरी के हाथों में अमृत कलश था। यही कारण होगा कि लोग इस दिन बर्तन खरीदना शुभ मानते हैं। पौराणिक कथाओं में धनवंतरि के जन्म का वर्णन करते हुए बताया गया है कि देवताओं और असुरों के समुद्र मंथन से धनवंतरि का जन्म हुआ था। वह अपने हाथों में अमृत कलश लिए प्रकट हुए थे। इस कारण उनका नाम पीयूषपाणि धनवंतरि विख्यात हुआ। धनवंतरि को विष्णु का अवतार भी माना जाता है। परंपरा के अनुसार धनतेरस की शाम को यम के नाम का दीपक घर की देहलीज (बाहर) पर रखा जाता है और उनकी पूजा करके प्रार्थना की जाती है कि वह घर में प्रवेश नहीं करें। किसी को कष्ट नहीं पहुंच...

श्री कृष्ण ने अपने हाथों से कर्ण का अंतिम संस्कार क्यों किया?-Why did Shri Krishna perform the last rites of Karna on his own hands?

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कर्ण के पिता सूर्य और माता कुंती थे, लेकिन उनके पीछे एक रथ चालक था, इसलिए उन्हें सूतपुत्र कहा जाता था और इसीलिए उन्हें वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। इस लेख में आज हम महारथी कर्ण से जुड़ी कुछ रोचक बातें जानेंगे। द्रौपदी ने कर्ण को अपने पति के रूप में क्यों नहीं चुना? कर्ण द्रौपदी से प्यार करता था और उसे अपनी पत्नी बनाना चाहता था, साथ ही द्रौपदी भी कर्ण से बहुत प्रभावित थी और उसकी तस्वीर देखने के बाद, यह निर्णय लिया गया था कि वह अपने स्वयंवर में एक माला डालेगी। लेकिन फिर भी उसने ऐसा नहीं किया। द्रौपदी और कर्ण दोनों एक-दूसरे से शादी करना चाहते थे, लेकिन सूत्रपुत्र होने के कारण यह शादी नहीं हो सकी। नियति ने इन दोनों की शादी नहीं होने दी, जिसके परिणामस्वरूप कर्ण पांडवों से नफरत करने लगे। द्रौपदी ने कर्ण के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया क्योंकि उसे अपने परिवार के सम्मान को बचाना था। क्या आप जानते हैं कि द्रौपदी के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा देने के बाद कर्ण ने दो विवाह किए थे। आइए आपको बताते हैं कि किन परिस्थितियों में कर्ण ने शादी की। कर्ण ने दो विवाह किए थे अविवाहित रहते हुए कुंती ने...

गणेश चतुर्थी को क्यों नहीं देखना चाहिए चंद्र दर्शन?-Why should Ganesh Chaturthi not have moon sighting?

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गणेश चतुर्थी को क्यों नहीं देखना चाहिए चंद्र दर्शन? श्रीगणेश ने चंद्रमा को दिया श्राप: जब भगवान गणेश को गजा के रूप में रखा गया, तो उन्हें गजावादन कहा गया और माता-पिता के रूप में, वे पहली बार पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले पहले व्यक्ति बने। सभी देवताओं ने उसकी प्रशंसा की लेकिन चंद्रमा मंद मंद मुस्कुराता रहा। उसे अपनी सुंदरता पर गर्व था। गणेशजी समझ गए कि चंद्रमा को उन पर गर्व है। क्रोध में भगवान श्री गणेश ने चंद्रमा को श्राप दिया कि आज से तुम काले हो जाओगे। चंद्रमा को अपनी गलती का एहसास हुआ। जब उन्होंने भगवान गणेश से माफी मांगी, तो गणेश ने कहा कि सूर्य का प्रकाश पाने के बाद, आप एक दिन पूर्ण होंगे, अर्थात यह पूरी तरह से प्रकाशित हो जाएगा। लेकिन यह दिन आपको सजा देने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। इस दिन को याद करके कोई अन्य व्यक्ति उसकी सुंदरता पर गर्व नहीं करेगा। कोई भी व्यक्ति जो आपको भाद्रपद माह के उज्ज्वल पखवाड़े के चौथे दिन आज देखेगा, उस पर झूठा आरोप लगाया जाएगा। इसीलिए भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को चंद्र के रूप में नहीं देखा जाता है। भगवान कृष्ण पर चोरी का आरोप था: सत्यजीत नामक एक यदुव...

आखिर क्यों खाया था पांडवों ने अपने मृत पिता के शरीर का मांस ?

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आज हम आपको महाभारत से जुडी एक घटना बताते है जिसमे पांचो पांडवों ने अपने मृत पिता पाण्डु का मांस खाया था उन्होंने ऐसा क्यों किया यह जानने के लिए पहले हमे पांडवो के जनम के बारे में जानना पड़ेगा। पाण्डु के पांच पुत्र युधिष्ठर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव थे।  इनमे से युधिष्ठर, भीम और अर्जुन की माता कुंती तथा नकुल और सहदेव की माता माद्री थी। पाण्डु इन पाँचों पुत्रों के पिता तो थे पर इनका जनम पाण्डु के वीर्य तथा सम्भोग से नहीं हुआ था क्योंकि पाण्डु को श्राप था की जैसे ही वो सम्भोग करेगा उसकी मृत्यु हो जाएगी . इसलिए पाण्डु के आग्रह पर यह पुत्र कुंती और माद्री ने भगवान का आहवान करके प्राप्त किये थे। जब पाण्डु की मृत्यु हुई तो उसके मृत शरीर का मांस पाँचों भाइयों ने मिल बाट कर खाया था। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योकिं स्वयं पाण्डु की ऐसी इच्छा थी। चुकी उसके पुत्र उसके वीर्ये से पैदा नहीं हुए थे इसलिए पाण्डु का ज्ञान, कौशल उसके बच्चों में नहीं आ पाया था।  इसलिए उसने अपनी मृत्यु पूर्व ऐसा वरदान माँगा था की उसके बच्चे उसकी मृत्यु के पश्चात उसके शरीर का मांस मिल बाँट कर खाले ताकि उसका ज्ञान ब...

भगवान दत्तात्रेय और उनके 24 गुरु-Lord Dattatreya and his 24 Gurus

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जीवन में गुरु की अपनी एक विशेष जगह है। कहते है बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं होता।  सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए आपको किसी न किसी को गुरु बनाना पड़ता है चाहे फिर वो एकलव्य की तरह मिट्टी की मूरत ही क्यों ना हों। गुरु की इसी महता को प्रमाणित करते है भगवान दत्तात्रेय जो की स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे फिर भी उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरु बनाए जिसमे कीट, पक्षी और जानवर तक शामिल है। उन्होंने जिससे भी कुछ सीखा उसे अपना गुरु माना। कौन है भगवान दत्तात्रेय भगवान दत्तात्रेय ब्रह्माजी के मानस पुत्र ऋषि अत्रि के पुत्र हैं। इनकी माता का नाम अनुसूइया था। कई ग्रंथों यह बताया गया है कि ऋषि अत्रि और अनुसूइया के तीन पुत्र हुए। ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा, शिवजी के अंश से दुर्वासा ऋषि, भगवान विष्णु के अंश दत्तात्रेय का जन्म हुआ। कहीं-कहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि भगवान दत्तात्रेय ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सम्मिलित अवतार हैं। - See  पृथ्वी- सहनशीलता व परोपकार की भावना सीख सकते हैं। पृथ्वी पर लोग कई प्रकार के आघात करते हैं, कई प्रकार के उत्पात होते हैं, कई प...