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हरतालिका तीज व्रत कथा Hartalika Teej vrat katha

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भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाले हरतालिका तीज व्रत की कथा इस प्रकार से है- हरतालिका तीज व्रत ( Hartalika Teej Vrat Katha in Hindi) कथानुसार मां पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर काटी और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा पीकर ही व्यतीत किया। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुखी थे। इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव लेकर मां पार्वती के पिता के पास पहुंचे , जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब मां पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वह बहुत दुखी हो गई और जोर-जोर से विलाप करने लगी। फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वह यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं जबकि उनके पिता उनका विवाह विष्णु से कराना चाहते हैं। तब सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गई और वह...

महाशिवरात्रि की कथा Maha Shivratri Vrat Katha

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Maha Shivratri Vrat Katha महाशिवरात्रि पूजाविधि शिवपुराणके अनुसार व्रती पुरुषको महाशिवरात्रिके दिन प्रातःकाल उठकर स्न्नान-संध्या आदि कर्मसे निवृत्त होने पर मस्तकपर भस्मका त्रिपुण्ड्र तिलक और गलेमें रुद्राक्षमाला धारण कर शिवालयमें जाकर शिवलिंगका विधिपूर्वक पूजन एवं शिवको नमस्कार करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ उसे   श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रतका इस प्रकार संकल्प करना चाहिये- शिवरात्रिव्रतं ह्यतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम्‌। निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते॥ महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान तथा `ओम हीं ईशानाय नम:’ का जाप करें। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके `ओम हीं अधोराय नम:’ का जाप करें। तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र `ओम हीं वामदेवाय नम:’ तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं `ओम हीं सद्योजाताय नम:’ मंत्र का जाप करें। महाशिवरात्रि मंत्र एवं समर्पण सम्पूर्ण – महाशिवरात्रि पूजा विधि के दौरान ‘ओम नम: शिवाय’ एवं ‘शिवाय नम:’मंत्र का जाप करना चाहि‌ए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचाम...

Shri Vaibhav Laxmi Vrat Katha श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

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Shri Vaibhav Laxmi Vrat Katha एक समय की बात है कि एक शहर में एक शीला नाम की स्त्री अपने पति के साथ रहती थी. शीला स्वभाव से धार्मिक प्रवृ्ति की थी. और भगवान की कृ्पा से उसे जो भी प्राप्त हुआ था, वह उसी में संतोष करती थी. शहरी जीवन वह जरूर व्यतीत कर रही थी, परन्तु शहर के जीवन का रंग उसपर नहीं चढा था. भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव और परोपकार का भाव उसमें अभी भी था. वह अपने पति और अपनी ग्रहस्थी में प्रसन्न थी. आस-पडौस के लोग भी उसकी सराहना किया करते थें. देखते ही देखते समय बदला और उसका पति कुसंगति का शिकार हो गया. वह शीघ्र अमीर होने का ख्वाब देखने लगा. अधिक से अधिक धन प्राप्त करने के लालच में वह गलत मार्ग पर चल पडा, जीवन में रास्ते से भटकने के कारण उसकी स्थिति भिखारी जैसी हो गई. बुरे मित्रों के साथ रहने के कारण उसमें शराब, जुआ, रेस और नशीले पदार्थों का सेवन करने की आदत उसे पड गई. इन गंदी आदतों में उसने अपना सब धन गंवा दिया. अपने घर और अपने पति की यह स्थिति देख कर शीला बहुत दु:खी रहने लगी. परन्तु वह भगवान पर आस्था रखने वाली स्त्री थी. उसे अपने देव पर पूरा विश्वास था. एक दिन दोपहर के समय उसके घर के ...

Vat Savitri Vrat Katha वट सावित्री व्रत कथा

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Vat Savitri Vrat Katha  वट सावित्री अमावस्या के पूजन की प्रचलित कहानी के अनुसार सावित्री अश्वपति की कन्या थी, उसने सत्यवान को पति रूप में स्वीकार किया था। सत्यवान लकड़ियां काटने के लिए जंगल में जाया करता था। सावित्री अपने अंधे सास-ससुर की सेवा करके सत्यवान के पीछे जंगल में चली जाती थी। एक दिन सत्यवान को लकड़ियां काटते समय चक्कर आ गया और वह पेड़ से उतरकर नीचे बैठ गया। उसी समय भैंसे पर सवार होकर यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। सावित्री ने उन्हें पहचाना और सावित्री ने कहा कि आप मेरे सत्यवान के प्राण न लें। यम ने मना किया, मगर वह वापस नहीं लौटी। सावित्री के पतिव्रत धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान के रूप में अंधे सास-ससुर की सेवा में आंखें दीं और सावित्री को सौ पुत्र होने का आशीर्वाद दिया और सत्यवान को छोड़ दिया। इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म से मृत पति को पुन: जीवित कराया था. तभी से यह व्रत ‘वट सावित्री व्रत’ के नाम से जाना जाता है। वट पूजा से जुड़ी धार्मिक मान्यता के अनुसार तभी से महिलाएं इस दिन को वट अमावस्या के रूप में पूजती हैं। वट सावित्री व्रत विधि भारतीय धर्म...

Ganesh Chaturthi Katha गणेश चतुर्थी कथा

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Ganesh Chaturthi Katha गणेश चतुर्थी कथा        Ganesh Chaturthi Katha गणेश चतुर्थी कथा  भाद्रपद माह की शुक्ल  की चतुर्थी गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध है । इस दिन प्रात: काल स्नान   आदि से निवृत्त होकर सोना ,  तांबा ,  चांदी ,  मिट्टी या गोबर से गणेश की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिए । पूजन के समय इक्कीस मोदकों का भोग लगाते हैं तथा हरित दुर्वा के इक्कीस अंकुर लेकर निम्न दस नामों पर चढ़ाने चाहिए  - 1.    गतापि ,        2.   गोरी सुमन ,  3.   अघनाशक ,  4.  एकदन्त ,      5.  ईशपुत्र    6.    सर्वसिध्दिप्रद , 7.  विनायक ,       8.  कुमार गुरू ,           9.  इंभवक्त्राय और    10.  मूषक वाहन संत  । तत्पश्चात्  इक्कीस लड्डूओं  में से दस लड्डू    ब्राम्हाणों को दान देना चाहिए तथा ग्यारह लड्डू स्वयं खाने च...

सावन के सोमवार के व्रत की कथा Saavan somvaar vrat katha

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Shravan (Sawan) Somvar Vrat सावन का पूरा महीना यूं तो भगवान शिव को अर्पित होता ही है पर सावन के पहले सोमवार को भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल मिलता है. भारत के सभी द्वादश शिवलिंगों पर इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. आदिकाल से ही इस दिन का विशेष महत्व रहा है. कहा जाता है सावन के सोमवार का व्रत करने से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है और दूध की धार के साथ भगवान शिव से जो मांगो वह वर मिल जाता है. shiv parivarसावन के सोमवार की महिमा अपार है और इसीलिए हम आपके लिए सोमवार के व्रत की कथा और उसके पूजन की विधि को लेकर आएं हैं. पिछले कुछ ब्लॉगों में हमने आपको कई अहम चालिसाओं, आरतियों और अन्य धार्मिक चीजों से रूबरू करवाया और अब हमारा प्रयास है कि हम उन सभी लोगों की मदद करें जो व्रत रखते हैं. सावन के सोमवार के व्रत की कथा एक कथा के अनुसार जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था. अपने दूस...

Pardosh Vrat Katha प्रदोष व्रत कथा

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Pardosh Vrat Katha प्रत्येक माह की दोनों पक्षों की त्रयोदशी के दिन संध्याकाल के समय को "प्रदोष" कहा जाता है और इस दिन शिवजी को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत रखा जाता है। प्रदोष व्रत की कथा निम्न है: प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया। कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरु किया। एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे...

Sakat Chauth Vrat Katha संकट चौथ व्रत

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Sakat Chauth Vrat Katha संतान की कुशलता की कामना व लंबी आयु हेतु भगवान गणेश और माता पार्वती की विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए, व्रत का आरंभ तारों की छांव में करना चाहिए व्रतधारी को पूरा दिन अन्न, जल ग्रहण किए बिना मंदिरों में पूजा अर्चना करनी चाहिए और बच्चों की दीर्घायु के लिए कामना करनी चाहिए. इसके बाद संध्या समय पूजा की तैयारी के लिए गुड़, तिल, गन्ने और मूली को उपयोग करना चाहिए. व्रत में यह सामग्री विशेष महत्व रखती है, देर शाम चंद्रोदय के समय व्रतधारी को तिल, गुड़ आदि का अ‌र्घ्य देकर भगवान चंद्र देव से व्रत की सफलता की कामना करनी चाहिए. माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का व्रत लोक प्रचलित भाषा में इसे सकट चौथ कहा जाता है. इस दिन संकट हरण गणेशजी तथा चंद्रमा का पूजन किया जाता है, यह व्रत संकटों तथा दुखों को दूर करने वाला तथा सभी इच्छाएं व मनोकामनाएं पूरी करने वाला है. इस दिन स्त्रियां निर्जल व्रत करती हैं गणेशजी की पूजा की जाती है और कथा सुनने के बाद चंद्रमा को अर्ध्य देकर ही व्रत खोला जाता है| विधि :  संकट चौथ व्रत किसी नगर में एक कुम्भार रहता था । एक बार उसने बर्तन बनाकर आंवा लगाय...

Holi Poojan and Katha होली पूजन कथा

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Holi Poojan and Katha Holi Katha- 1 होली का त्यौहार कई पौराणिक गाथाओं से जुडा हुआ है। इनमें कामदेव प्रह्लाद और पूतना की कहानियां प्रमुख है। प्रत्येक कहानी के अंत में सत्य की विजय होती है और राक्षसी प्रवृत्तियों का अंत होता है। पहली कहानी शिव और पार्वती की है। हिमालय पुत्री पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो जाये पर शिवजी अपनी तपस्या में लीन थे। कामदेव पार्वती की सहायता को आये। उन्होंने प्रेम बाण चलाया और भगवान शिव की तपस्या भंग हो गयी। शिवजी को बडा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया। फिर शिवजी ने पार्वती को देखा। पार्वती की आराधना सफल हुई और शिवजी ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है। होली का त्यौहार प्रह्लाद और होलिका की कथा से भी जुडा हुआ है। प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यपु नास्तिक थे। वह चाहते थे कि उनका पुत्र भगवान नारायण की आराधना छोड दे। परन्तु प्रह्लाद इस बात के लिये तैयार नहीं था। हिरण्यकश्यपु...

Deepavali / Diwali Katha दीपावली व्रत कथा

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Deepavali / Diwali Katha एक बार सनतकुमार ने ऋषि-मुनियों से कहा- महानुभाव! कार्तिक की अमावस्या को प्रातःकाल स्नान करके भक्तिपूर्वक पितर तथा देव पूजन करना चाहिए। उस दिन रोगी तथा बालक के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को भोजन नहीं करना चाहिए। सायंकाल विधिपूर्वक लक्ष्मी का मंडप बनाकर उसे फूल, पत्ते, तोरण, ध्वजा और पताका आदि से सुसज्जित करना चाहिए। अन्य देवी-देवताओं सहित लक्ष्मी का षोड्शोपचार पूजन करना चाहिए। पूजनोपरांत परिक्रमा करनी चाहिए। मुनिश्वरों ने पूछा- लक्ष्मी पूजन के साथ अन्य देवी-देवताओं के पूजन का क्या कारण है? सनतकुमारजी बोले- लक्ष्मीजी समस्त देवी-देवताओं के साथ राजा बलि के यहां बंधक थीं। तब आज ही के दिन भगवान विष्णु ने उन सबको कैद से छुड़ाया था। बंधन मुक्त होते ही सब देवता लक्ष्मीजी के साथ जाकर क्षीरसागर में सो गए। इसलिए अब हमें अपने-अपने घरों में उनके शयन का ऐसा प्रबंध करना चाहिए कि वे क्षीरसागर की ओर न जाकर स्वच्छ स्थान और कोमल शय्या पाकर यहीं विश्राम करें। जो लोग लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारियां उत्साहपूर्वक करते हैं, उनको छोड़कर वे कहीं भी नहीं जातीं। रात्रि के समय लक्ष्मीजी का आ...

16 सोमवार व्रत कथा (16 Somvar Vrat Katha)

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16 Somvar Vrat Katha वैसे श्रावण मास का प्रत्येक दिन पवित्र माना जाता है, पर सोमवार को विशेष पूजा होती है। पौराणिक मान्यता है कि श्रावण मास में हुए समुद्र मंथन से निकले हलाहल का पान सोमवार को ही शिव ने किया था। शिव अपने सिर पर सोम (चंद्रमा) को धारण करते हैं। पहली सोमवारी को ले व्रत व पूजन की घर-घर में तैयारी है। कैसे रखें सोमवारी व्रत प्राचीन ग्रंथों के अनुसार सोमवार व्रत के तीन प्रकार हैं। सोमवार, सोलह सोमवार, सौभ्य प्रदोष। परंतु व्रत को श्रावण मास में आरंभ करना शुभ माना जाता है। व्रत सोमवार सूर्योदय से प्रारंभ होकर तीसरे पहर तक रखा जाता है। कुछ भक्त सूर्योदय से सूर्यास्त तक निर्जला रहते हैं। कुछ फलाहार करते हैं तो कुछ नमक रहित भोजन। सोमवार व्रत की कथा सुनी जाती है, आरती व प्रसाद वितरण किया जाता है। गौरक्षणी की इंदु देवी कहती हैं विगत 25 वर्षो से सोमवारी व्रत रख रही हैं। इससे शिव की कृपा बनी रहती है। कालीस्थान के ओमप्रकाश सिंह कहते हैं सोमवारी व्रत से नयी उर्जा व शक्ति मिलती है। सोमवार व्रत कथा- एक समय श्री भूतनाथ महादेव जी मृत्युलोक में विवाह की इच्छा करके माता पार्वती के साथ पधारे। ...

छठ पूजा – सूर्य षष्ठी

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छठ पूजा – सूर्य षष्ठी कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी का व्रत करने का विधान है । इसे करने वाली स्त्रियाँ धन-धान्य, पति-पुत्र तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहती   हैं। यह व्रत बडे नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। इसमे तीन दिन के कठोर उपवास का विधान है । इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को पंचमी को एक बार नमक रहित भोजन करना पडता है। षष्ठी को निर्जल रहकर व्रत करना पडता है । षष्ठी को अस्त होते हुए सूर्य को विधिपूर्वक पूजा करके अर्घ्य देते हैं। सप्तमी के दिन प्रात:काल नदी या तालाब पर जाकर स्नान करती हैं। सूर्योदय होते ही अर्घ्य देकर जल ग्रहण करके व्रत को खोलती हैं। सूर्यषष्ठी-व्रतकेअवसरपर सायंकालीन प्रथम अर्घ्यसे पूर्व मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर षष्ठीदेवीका आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्यके पूर्व षष्ठीदेवीका पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमीके सायंकालसेही घरमें भगवती षष्ठीका आगमन हो जाता है। इस प्रकार भगवान्‌ सूर्यके इस पावन व्रतमें शक्ति और ब्रह्म दोनोंकी उपासनाका फल एक साथ प्राप्त होता है ।   इसीलिये लोकमें यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नामसे विख्या...

श्री गणेश संकट चौथ व्रत Shri Ganesh Sankat Chouth Vrat

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Shri Ganesh Sankat Chouth Vrat गणेश चतुर्थी का व्रत माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है| इस दिन विधा – बुद्धि – वारिधि के सवामी गणेश तथा चंद्रमा की पूजा की जाती है | माता   पार्वती ने भी भगवान शंकर के कहने पर माघ कृष्ण चतुर्थी को संकष्ट हरण श्री गणेश जी का व्रत रखा था | फलस्वरूप उन्हें गणेश जी पुत्रस्वरूप में प्राप्त हुए| भगवान शंकर के मस्तक पर सुशोभित होने वाला चंद्रमा आज के दिन श्री गणेश भगवान के मस्तक पर विराजमान होता है| इसलिए आज चंद्रा दर्शन का अर्थ है श्री गणेश भगवान के दर्शन होना| माघ   मास में ‘भालचन्द्र’ नामक गणेश की पूजा करनी चाहिए | इनका पूजन षोडशोउपचार   विधि से करना चाहिए | तिल के दस लड्डू बनाकर, पांच लड्डू देवता को चढ़ावे और शेष पांच ब्रह्मण को दान दे देवें | मोदक तथा गुड मे बने तिल (सफेद) के लड्डू और मगदल का नैवेद्या अर्पित करें- चावल के लड्डू भी चढ़ाएं | चंद्र दर्शनकरें और चंद्रमा को भी अर्घ्या प्रदान करें| क्योंकि इस दिन भगवान गणेश चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करतें हैं| माघ कृष्ण – गणेश चतुर्थी व्रत कथा ( ऋषि शर्मा ब्राह्मण की कथा ) पढ़े या ...

जीवित पुत्रिका व्रत कथा (Jivit Putrika Vrat Katha)

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जीवित पुत्रिका व्रत कथा (Jivit Putrika Vrat Katha) भारतीय संस्कृति अपने पर्व त्यौहारों की वजह से ही इतनी फली-फूली लगती है. यहां हर पर्व और त्यौहार का कोई ना कोई महत्व होता ही है. कई ऐसे भी पर्व हैं जो हमारी सामाजिक और पारिवारिक संरचना को मजबूती देते हैं जैसे जीवित्पुत्रिका व्रत, करवा चौथ आदि. इसमें से ही एक है जीवित्पुत्रिका व्रत यानि जीवित पुत्र के लिए रखा जाने वाला व्रत. यह व्रत वह सभी सौभाग्यवती स्त्रियां रखती हैं जिनको पुत्र होते हैं. और साथ ही जिनके पुत्र नहीं होते वह भी पुत्र कामना और बेटी की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं. आश्विन मास के कृष्णपक्ष की प्रदोषकाल-व्यापिनी अष्टमी के दिन माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सम्पन्नता हेतु यह व्रत करती हैं. इसे ग्रामीण  इलाकों में “जीउतिया” के नाम से जाना जाता है. मिथिलांचल तथा उत्तर प्रदेश के पूर्वाचल में इस व्रत की बडी मान्यता है. माताएं इस व्रत को बडी श्रद्धाके साथ करती हैं. जीवित्पुत्रिका व्रत कथा जीवित्पुत्रिका-व्रत के साथ जीमूतवाहन की कथा जुड़ी है. संक्षेप में वह इस प्रकार है – गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन...

शरद पूर्णिमा कथा Sharad Poornima Katha

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Sharad Poornima Katha आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला त्यौहार शरद पूर्णिमा की कथा कुछ इस प्रकार से है- एक साहूकार के दो पुत्रियां थी. दोनों पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थी, परन्तु बड़ी पुत्री विधिपूर्वक पूरा व्रत करती थी जबकि छोटी पुत्री अधूरा व्रत ही किया करती थी. परिणामस्वरूप साहूकार के छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी. उसने पंडितों से अपने संतानों के मरने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि पहले समय में तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत किया करती थी, जिस कारणवश तुम्हारी सभी संतानें पैदा होते ही मर जाती है. फिर छोटी पुत्री ने पंडितों से इसका उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि यदि तुम विधिपूर्वक पूर्णिमा का व्रत करोगी, तब तुम्हारे संतान जीवित रह सकते हैं. साहूकार की छोटी कन्या ने उन भद्रजनों की सलाह पर पूर्णिमा का व्रत विधिपूर्वक संपन्न किया. फलस्वरूप उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई परन्तु वह शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो गया. तब छोटी पुत्री ने उस लड़के को पीढ़ा पर लिटाकर ऊपर से पकड़ा ढ़क दिया. फिर अपनी बड़ी बहन को बुलाकर ले आई और उसे बैठने के लिए वही पीढ़ा दे दिया. बड़ी बहन ...

श्री सत्यनारारण कथा Satya Narayan Katha

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Satya Narayan Katha भगवान सत्यनारायण विष्णु के ही रूप हैं (God Satyanarayan is an incarnation of God Vishnu)। कथा के अनुसार इन्द्र का दर्प भंग करने के लिए विष्णु जी ने नर और नारायण के रूप में बद्रीनाथ में तपस्या किया था वही नारायण सत्य को धारण करते हैं अत: सत्य नारायण कहे जाते हैं। इनकी पूजा में केले के पत्ते व फल के अलावा पंचामृत, पंच गव्य, सुपारी, पान, तिल, ज, मोली, रोली, कुमकुम, दूर्वा की आवश्यक्ता होती जिनसे भगवान की पूजा होती है। सत्यनारायण की पूजा के लिए दूध, मधु, केला, गंगाजल, तुलसी पत्ता, मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है जो भगवान को काफी पसंद है। इन्हें प्रसाद के तर पर फल, मिष्टान के अलावा आटे को भून कर उसमें चीनी मिलाकर एक प्रसाद बनता वह भी भोग लगता है। आप जब सत्यनारण की कथा करवायें तो इन सामग्रियों की व्यवस्था कर लें। स्कन्द पुराण के रेवाखंड में विस्तार पूर्वक बताया गया है (Satyanarayan Pooja and its story is written in detail in Reva khand this is a part of Skand Purana)। भगवान श्री सत्यनारयण की पूजन विधि से पूर्व आइये हम स्कन्द पुराण के रेखाखंड से भगवान श्री सत्यनाराय...