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गुड़ी पड़वा (Gudi Padwa)

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चैत्र   मास  की  शुक्ल   प्रतिपदा  को  गुड़ी पड़वा  या  वर्ष प्रतिपदा  या उगादि (युगादि) कहा जाता है। इस दिन  हिन्दु  नववर्ष का आरम्भ होता है। 'गुड़ी' का अर्थ 'विजय पताका' होता है। कहते हैं शालिवाहन नामक एक कुम्हार-पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से प्रभावी शत्रुओं का पराभव किया। इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की  संधि  से बना है ‘युगादि‘।  आंध्र प्रदेश  और  कर्नाटक  में ‘उगादि‘ और  महाराष्ट्र  में यह पर्व 'ग़ुड़ी पड़वा' के रूप में मनाया जाता है। परिचय कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है,...

गंगा दशहरा Ganga Dashahara

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प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है. स्कंदपुराण के अनुसार गंगा दशहरे के दिन व्यक्ति को किसी भी पवित्र नदी पर जाकर स्नान, ध्यान तथा दान करना चाहिए. इससे वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. यदि कोई मनुष्य पवित्र नदी तक नहीं जा पाता तब वह अपने घर पास की किसी नदी पर स्नान करें. ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को संवत्सर का मुख कहा गया है. इसलिए इस इस दिन दान और स्नान का ही अत्यधिक महत्व है. वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी. इस पवित्र नदी में स्नान करने से दस प्रकार के पाप नष्ट होते है. गंगा दशहरे का महत्व | Importance of Ganga Dusshera भगीरथी की तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की  दशमी थी. गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा. इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है. गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जन जिस भी...

शाकंभरी जयंती-क्यों लिया देवी माँ ने भ्रामरी देवी और शाकंभरी माता का अवतार?-Shakambhari Jayanti - Why did Mother Goddess incarnate Bhramari Devi and Shakambhari Mother?

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पूर्व समय की बात है। अरुण नामक दैत्य ने कठोर नियमों का पालन कर भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव प्रकट हुए और अरुण से वर मांगने को कहा। अरुण ने वर मांगा कि कोई युद्ध में मुझे नहीं मार सके न किसी अस्त्र-शस्त्र से मेरी मृत्यु हो, स्त्री-पुरुष के लिए मैं अवध्य रहूं और न ही दो व चार पैर वाला प्राणी मेरा वध कर सके। साथ ही मैं देवताओं पर विजय प्राप्त कर सकूं। ब्रह्माजी ने उसे यह सारे वरदान दे दिए। वर पाकर अरुण ने देवताओं से स्वर्ग छीनकर उस पर अपना अधिकार कर लिया। सभी देवता घबराकर भगवान शंकर के पास गए। तभी आकाशवाणी हुई कि सभी देवता देवी भगवती की उपासना करें, वे ही उस दैत्य को मारने में सक्षम हैं। आकाशवाणी सुनकर सभी देवताओं ने देवी की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर देवी ने देवताओं को दर्शन दिए। उनके छह पैर थे। वे चारों ओर से असंख्य भ्रमरों (एक विशेष प्रकार की बड़ी मधुमक्खी) से घिरी थीं। उनकी मुट्ठी भी भ्रमरों से भरी थी। भ्रमरों से घिरी होने के कारण देवताओं ने उन्हें भ्रामरी देवी के नाम से संबोधित किया। देवताओं से पूरी बात जानकार देवी ने उन्हें आश्वस्त किया तथा भ्रमरों क...

संत झूलेलाल जी : हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के भगवान-संत झूलेलाल जी: हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के भगवान

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समूचे विश्व में फैले सिंधी समुदाय के लोग प्रतिवर्ष चैत्रमास की चन्द्रतिथि को अपने आराध्य देव संत झूलेलाल का जन्मोत्सव प्रेम-भाईचारे एवं राष्ट्रीय एकता के रूप में मनाते हैं। इस दिन को ‘सिंधी दिवस’ या ‘सिंधियत’ भी कहा जाता है। जलपति वरुणावतार भगवान झूलेलाल भगवान श्री कृष्ण के ही अवतार माने जाते हैं। संत झूलेलाल के संबंध में यह कहा जाता है कि लगभग 1040 वर्ष पूर्व सिंध (पाकिस्तान) में मुगल बादशाह मिरखशाह के अत्याचारों से जनता बेहद त्रस्त थी। बादशाह मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए जनता पर जुल्म ढाने लगा तो चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई और इस संकट की घड़ी में त्रस्त लोगों ने सिंधु नदी के तट पर वरुण देव की पूजा-अर्चना कर बादशाह के अत्याचारों से छुटकारा पाने की प्रार्थना की।     लगभग सात दिन तक लोगों ने ‘वरुण देव’ की पूजा की। तब अपने भक्तों की पुकार सुन वरुण देवता मछली पर सवार होकर संत ‘झूलेलाल’ के रूप में प्रकट हुए और कहा कि वह शीघ्र ही अत्याचारियों का नाश करने के लिए नसीरपुर शहर में रतन राय के घर जन्म लेंगे। कुछ समय बाद संत झूलेलाल ने माता देवकी की कोख से जन्म लिया और बालक का नाम घर वालों...

नरक चतुर्दशी कथा​ (काली चौदस)-Narak Chaturdashi story (Kali Chaudas)

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नरक चतुर्दशी कथा कार्तिक महीने में कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी को रूप चौदस, नरक चतुर्दशी कहते हैं। बंगाल में यह दिन मां काली के जन्म दिन के रूप में काली चौदस के तौर पर मनाते हैं। इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं। इस दिन स्नानादि से निपट कर यमराज का तर्पण करके तीन अंजलि जल अर्पित किया जाता है। संध्या के समय दीपक जलाए जाते हैं। चौदस और अमावस्या तीनों दिन दीपक जलाने से यम यातना से मुक्ति मिलती है तथा लक्ष्मी जी का साथ बना रहता है। नरक चौदस की कहानी :- प्राचीन समय की बात है। रन्तिदेव नामक का एक राजा था। वह पहले जन्म में बहुत धर्मात्मा एवं दानी था। दूर-दूर तक उसकी बहुत ही ख्याति थी। अपने पूर्व जन्म के कर्मो की वजह से वह इस जन्म में भी अपार दान आदि देकर बहुत से सत्कार्य किए। दान धर्म करके सबका भला करता था। जरुरत मन्दो को कभी भी निराश नहीं होने देता था। कुछ समय पश्चात राजा बूढ़ा हो गया, उनके अंत समय में यमराज के दूत लेने आए। राजा को देखकर डराकर घूरते हुए कहा राजन ! राजन तुम्हारा समय समाप्त हो गया अब तुम नरक में चलो। तुम्हे वही चलना पड़ेगा। राजा ने सोचा भी नहीं था कि उसे नरक जाना पड़ेगा।  राजा ने घबरा...

Vishwakarma Puja-विश्वकर्मा पूजा

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भारत देश में अनेक हिन्दू धर्म के त्यौहार मनाये जाते है। उन्ही त्यौहार में से विश्वकर्मा पूजा भी एक बहुत प्रसिद्ध हिन्दू त्यौहार है। विश्वकर्मा पूजा हर साल 17 सितम्बर को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। कई जगह दिवाली से अगले दिन भी भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा की जाती है 11 सदी पुराना है ये मंदिर, मुरादों और रहस्य के लिए दुनिया झुकाती है शीश हमारे देश में रेल से लेकर सुई तक बड़े-बड़े इंजीनयर की सहायता से बनाये जाते है। तो क्या कभी सोचा है की ये जो ब्रह्माण्ड है उसे तो भी किसी ने बनाया ही होगा या किसी के द्वारा बनाया गया होंगा तो इसका जवाब हिन्दू धर्म में देवताओ के इंजीनयर यानि शिल्पकार देव भगवान विश्वकर्मा को माना जाता है। पुराणों के अनुसार सृस्टि की रचना आदिदेव ब्रह्मा जी को माना जाता है। विश्वकर्मा जी की सहायता से इस सृष्टि का निर्माण हुआ, इसी कारण इन्हें आज के समय में देवताओ का इंजीनियर भी कहा जाता है। जन्म की कथा:- हिन्दू धर्म शास्त्रो के अनुसार सबसे ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म के सातवे संतान जिनका नाम वास्तु था। विश्वकर्मा जी वास्तु के पुत्र थे जो अपने माता-पिता की भांति महान शिल्पकार हुए जि...

शीतला अष्टमी, बसौड़ा व्रत विधि और व्रत कथा (sheetala ashtami Basoda Vrat Katha & Vrat vidhi)

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शीतला अष्टमी  हिन्दुओं का एक त्योहार है जिसमें  शीतला माता  के व्रत और पूजन किये जाते हैं। ये होली सम्पन्न होने के अगले सप्ताह में बाद करते हैं। प्रायः शीतला देवी की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होती है, लेकिन कुछ स्थानों पर इनकी पूजा होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार के दिन ही की जाती है। भगवती शीतला की पूजा का विधान भी विशिष्ट होता है। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग यानि  बसौड़ा  तैयार कर लिया जाता है। अष्टमी के दिन बासी पदार्थ ही देवी को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता है और भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इस कारण से ही संपूर्ण उत्तर भारत में शीतलाष्टमी त्यौहार, बसौड़ा के नाम से विख्यात है।ऐसी मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी खाना खाना बंद कर दिया जाता है।[2] ये ऋतु का अंतिम दिन होता है जब बासी खाना खा सकते हैं। प्राचीनकाल से ही  शीतला माता  का बहुत अधिक माहात्म्य रहा है।  स्कंद पुराण  में शीतला देवी शीतला का वाहन  गर्दभ  बता...

Shani Dev Jayanti-शनि देव जयंती

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क्या महत्व है कैसे करें शनिदेव की पूजा जयंती माह की अमावस्या को शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन शनिदेव की पूजा करने से सभी शनि के कोप का भाजन बनने से बचा जा सकता है यदि पहले से ही कोई शनि के प्रकोप को झेल रहा है तो उसके लिए भी यह दिन बहुत ही कल्याणकारी हो सकता है। आइये जानते हैं कि शनिदेव की पूजा कैसे की जाती है और इसका क्या महत्व है? कौन हैं शनिदेव शनिदेव भगवान सूर्य और छाया (अगस्त) के पुत्र हैं। इन्हें क्रूर ग्रह माना जाता है जो कि इन पत्नी के शाप के कारण मिला है। शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण कृष्ण है और ये गिद्ध की सवारी करते हैं। फलित ज्योतिष के अनुसार शनि को अशुभ माना जाता है व 9 योजनाओं में शनि का स्थान सातवां है। ये एक राशि में तीस महीने तक रहते हैं और मकर और कुंभ राशि के स्वामी माने जाते हैं। शनि की महादशा 19 वर्ष तक रहती है। शनि की गुरू और शक्ति पृथ्वी से 95 वें गुणा ज्यादा मानी जाती है। माना जाता है इसी तरह गुरुत्व बल के कारण हमारे अच्छे और ब्योरे विचार चुंबकीय शक्ति से शनि के पास पंहुचते हैं जिनकी कृत्य अनुसार...

Muharram-मुहर्रम

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Muharram ​ इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है मुहर्रम ​ इमाम हुसैन की शहादत की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। यह कोई त्योहार नहीं बल्कि मातम का दिन है। इमाम हुसैन अल्लाह के रसूल (मैसेंजर) पैगंबर मोहम्मद के नाती थे। यह हिजरी संवत का प्रथम महीना है। मुहर्रम एक महीना है, जिसमें शिया मुस्लिम दस दिन तक इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं। इस्लाम की तारीख में पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता यानी खलीफा चुनने का रिवाज रहा है। ऐसे में पैगंबर मोहम्मद के बाद चार खलीफा चुने गए। लोग आपस में तय करके किसी योग्य व्यक्ति को प्रशासन, सुरक्षा इत्यादि के लिए खलीफा चुनते थे। जिन लोगों ने हजरत अली को अपना इमाम (धर्मगुरु) और खलीफा चुना, वे शियाने अली यानी शिया कहलाते हैं। क्यों मनाते हैं मुहर्रम :- मोहम्मद साहब के मरने के लगभग 50 वर्ष बाद मक्का से दूर कर्बला के गवर्नर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया। कर्बला जिसे अब सीरिया के नाम से जाना जाता है। वहां यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था। इसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया। लोगों को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने ...

Eid-al-Adha-ईद अल - अज़्हा

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ईद अल - अज़्हा ईद अल-अधा (अरबी: عيد الىحʿ dīd al-a [ā [æiæd ʕlːdˤħæ] जिसका अर्थ है "बलिदान का त्योहार"), जिसे पर्व का पर्व भी कहा जाता है, मेजर महोत्सव, ग्रेटर ईद, कुर्बान बायराम (तुर्की: कुर्बान बयराम। बोस्नियाई: कुर्बान-बज्रम), ईद ए क़ुर्बान (फ़ारसी: عید قربان) या बकरीद (उर्दू: بیرا عید), हर साल दुनिया भर में मुसलमानों के लिए मनाए जाने वाले दो धार्मिक अवकाशों में से एक है। यह इब्राहीम (इब्राहिम) की इच्छा का सम्मान करता है कि वह अपने पहले जन्मे बेटे इश्माएल (इस्माइल) को ईश्वर की आज्ञा को सौंपने के कार्य के रूप में बलिदान करे, इससे पहले कि ईश्वर ने अब्राहम को बलि देने के लिए एक मेमने के साथ हस्तक्षेप किया। चंद्र आधारित इस्लामी कैलेंडर में, ईद अल-अधा, धू अल-हिजाह के 10 वें दिन पड़ता है और चार दिनों तक रहता है। अंतरराष्ट्रीय ग्रेगोरियन कैलेंडर में, तिथियां साल-दर-साल बदलती रहती हैं, प्रत्येक वर्ष लगभग 11 दिन पहले। ईद अल-अधा दो ईद की छुट्टियों का उत्तरार्ध है, पूर्व में ईद अल-फितर है। ईद अल-अधा का आधार कुरान की दूसरी सुरा अल-बकरा की 196 वीं आयत (आयत) से आता है। "ईद" शब...