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इदाना माता जी - देवी यहाँ अग्नि स्नान करती हैं-Idana Mata ji - Goddess performs fire bath here

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उदयपुर शहर से 60 किमी दूर कुबेरद-बम्बोरा मार्ग पर अरावली की विस्तृत पहाड़ियों के बीच स्थित है, मेवाड़ के प्रमुख शक्तिपीठ, इदाना माता जी। राजपूत समुदाय, भील ​​आदिवासी समुदाय सहित पूरे मेवाड़ की आराध्य माँ। स्थानीय लोगों में यह धारणा है कि लकवाग्रस्त मरीज माता के दरबार में आते हैं और ठीक हो जाते हैं। मां का दरबार पूरी तरह से एक चौकोर खुले में स्थित है। यह ज्ञात है कि यहां देवी की मूर्ति आत्म जागृत आग से महीने में दो से तीन बार स्नान करती है। इस अग्नि स्नान के साथ, माँ के धागे, धागे आदि का पूरा चयन किया जाता है। इस अग्नि स्नान के कारण, माँ का मंदिर यहाँ नहीं बनाया जा सका। मां की प्रतिमा के पीछे अनगिनत त्रिशूल हैं। यहां भक्त अपनी फरियाद पूरी करने के बाद त्रिशूल चढ़ाने आते हैं। इसके साथ ही, दंपति द्वारा संतान रत्न की प्राप्ति पर झूला झूलने की परंपरा है, जिनके बच्चे होते हैं। इसके अलावा, लकवाग्रस्त शरीर के एक विशेष हिस्से की वसूली पर, रोगियों के रिश्तेदारों द्वारा यहां चांदी या लकड़ी के हिस्सों की पेशकश की जाती है। प्रतिमा स्थापना का कोई इतिहास यहाँ के पुजारियों को ज्ञात नहीं है। बस इतना बता...

दंतेश्‍वरी मंदिर, शक्तिपीठ , छत्तीसगढ़-Danteshwari Temple, Shaktipeeth, Chhattisgarh

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छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की हसीन वादियों में स्तिथ है, दन्तेवाड़ा का प्रसिद्ध दंतेश्‍वरी मंदिर।  देवी पुराण में शक्ति पीठों की संख्या 51 बताई गई है जबकि तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। जबकि कई अन्य ग्रंथों में यह संख्या 108 तक बताई गई है। दन्तेवाड़ा को हालांकि देवी पुराण के 51 शक्ति पीठों में शामिल नहीं किया गया है लेकिन इसे देवी का 52 वा शक्ति पीठ माना जाता है।  मान्यता है की यहाँ पर सती का दांत गिरा था इसलिए इस जगह का नाम दंतेवाड़ा और माता क़ा नाम दंतेश्वरी देवी पड़ा। 51 शक्ति पीठों की जानकारी और शक्ति पीठों के निर्माण कि कहानी आप हमारे पिछले लेख 51 शक्ति पीठ में पढ़ सकते है। दंतेश्‍वरी मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदीयों के संगम पर स्तिथ हैं। दंतेश्‍वरी देवी  को बस्तर क्षेत्र की कुलदेवी का दर्ज़ा प्राप्त है। इस मंदिर की एक खासियत यह है की माता के दर्शन करने के लिए आपको लुंगी या धोति पहनकर ही मंदीर में जाना होगा।  मंदिर में सिले हुए वस्त्र पहन कर जानें की मनाही है। मंदिर के निर्माण की कथा : दन्तेवाड़ा शक्ति पीठ में माँ दन्तेश्वरी के मंदीर का निर्माण कब व कैसे हूआ इसक...

बिराजा (विराजा) देवी उत्कल -Biraja (Viraja) Devi Utkal Shaktipeeth

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भारत के ओडिशा राज्य (पूर्व में उड़ीसा या उत्कल) के जाजपुर जनपद (जिला-मुख्यालयः जाजपुर टाउन) में स्थित यह शक्तिपीठ मंदिर हिंदुओं का एक प्राचीन तीर्थस्थल है। यहां देवी सती के नाभि या नाड़ी गिरने की मान्यता है देवी सती के गिरे अंग के स्थान पर निर्मित इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी को देवी बिराजा (विराजा) या देवी गिरिजा के नाम से पूजा जाता है, जो देवी दुर्गा की दिव्य मूर्ति के रुप में यहां विराजमान हैं, जबकि देवी सती के साथ विराजमान भगवान शिव या भैरव भगवान जगन्नाथ के रुप में पूजे जाते हैं। यह शक्तिपीठ मंदिर बिराजा देवी मंदिर के नाम से विख्यात् है। मंदिर परिसर अत्यंत विशाल है, जहां बहुत सारे शिवलिंग और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी शोभायमान हैं। १३वीं शताब्दी में बना बिराजा मंदिर गिरिजा देवी मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है, जिसके गर्भगृह में शेर पर सवार बिराजा देवी के एक हाथ में भाला तो दूसरे हाथ में महिषासुर दैत्य की पूंछ विद्यमान है जाजपुर एक प्राचीन हिंदू तीर्थस्थल है, जिसका नाम राजा जजाति केशरी से पड़ा है। जाजपुर को देवी विमला के कारण विमलपुरी भी कहा जाता है। प्रसिद्ध बिराजा देवी मं...

टेकरी माता मंदिर शक्तिपीठ ( मां चामुंडा और मां तुलजा भवानी )

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इंदौर के प्रसिद्ध देवास टेकरी माता मंदिर ( मां चामुंडा और मां तुलजा भवानी )  ऐसी मान्यता है कि माताओं की दोनों मूर्तियां स्वयंभू हैं और जागृत स्वरूप में हैं। सच्चे मन से यहां जो भी मन्नत मांगी जाती है। वह हमेशा पूरी होती है। विद्वानों के मुताबिक देवी के 52 शक्तिपीठ में से मां चामुंडा, तुलजा दरबार को एक शक्तिपीठ के तौर पर माना जाता है। हालांकि, ऐसा बताया जाता है कि देश के अन्य शक्तिपीठों पर माता के शरीर के हिस्से गिरे थे। लेकिन, यहां टेकरी पर माता का रुधिर गिरा था। इस कारण मां चामुंडा का प्राकट्य यहां हुआ। चामुंडा को सात माताओं में माना जाता है। तुलजा भवानी की स्थापना मराठी राज परिवारों ने करवाई थी। मराठी राजाओं की यह कुलदेवी मानी जाती हैं। यह दोनों माताएं सगी बहनें हैं। महाराज विक्रमादित्य के भाई भतृहरि यहां तपस्या कर चुके हैं। उन्हें दो हजार साल से ज्यादा हो गए हैं। ऐसे में मंदिर की प्राचीनता का कोई प्रमाण नहीं है। मंदिर अनादिकाल से है। लोक मान्यता है कि देवी मां के दोनों स्वरूप जागृत अवस्था में हैं। बड़ी मां तुलजा भवानी और छोटी मां चामुण्डा देवी बहनें हैं। ऐसी मान्यता है कि एक बा...

Sri Vindhyachal Dham, Shaktipeeth-श्री विंध्याचल धाम, शक्तिपीठ

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श्री विन्ध्याचल धाम ।​ देवी भक्तों का विश्व प्रसिद्ध धाम है उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विन्ध्य पहाड़ियों पर स्थित आदि शक्ति श्री दुर्गा जी का मन्दिर, जिसे दुनिया विन्ध्याचल मंदिर के नाम से पुकारती है ! यह आदि शक्ति माता विंध्यवासिनी का धाम अनादी काल से ही साधकों के भी लिए प्रिय सिद्धपीठ रहा है। विंध्याचल मंदिर पौराणिक नगरी काशी से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है विंध्याचल। सबसे खास बात यह है कि यहां तीन किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों देवियों के दर्शन किए बिना विंध्याचल की यात्रा अधूरी मानी जाती है। तीनों के केन्द्र में हैं मां विंध्यवासिनी। यहां निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। माता के दरबार में तंत्र-मंत्र के साधक भी आकर साधना में लीन होकर माता रानी की कृपा पाते हैं। नवरात्र में प्रतिदिन विश्व के कोने-कोने से भक्तों का तांता जगत जननी के दरबार में लगता है। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल क्षेत्र का अस्तित्व सृष्टि से पूर्व का है तथा प्रलय के बाद...

Pavagadh Shaktipeeth, Gujarat-पावागढ़ शक्तिपीठ, गुजरात

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पंखिड़ा तू उड़ी ने जजे पावागढ़ रे...। म्हारी महाकाली ने जई ने किजो गरबो रमे रे...। शक्ति के उपासकों के लिए वेबदुनिया इस बार लेकर आया है गुजरात की ऊंची पहाड़ी पर बसा पावागढ़ मंदिर। काली माता का यह प्रसिद्ध मंदिर मां के शक्तिपीठों में से एक है। शक्तिपीठ उन पूजा स्थलों को कहा जाता है, जहां सती मां के अंग गिरे थे। पुराणों के अनुसार पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित हुई सती ने योगबल द्वारा अपने प्राण त्याग दिए थे। सती की मृत्यु से व्यथित शिवशंकर उनके मृत शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भटकते रहे। इस समय मां के अंग जहां-जहां गिरे वहीं शक्तिपीठ बन गए। माना जाता है कि पावागढ़ में मां के वक्षस्थल गिरे थे। जगतजननी के स्तन गिरने के कारण इस जगह को बेहद पूजनीय और पवित्र माना जाता है। यहां की एक खास बात यह भी है कि यहां दक्षिण मुखी काली मां की मूर्ति है, जिसकी दक्षिण रीति अर्थात तांत्रिक पूजा की जाती है। इस पहाड़ी को गुरु विश्वामित्र से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि गुरु विश्वामित्र ने यहां काली मां की तपस्या की थी। यह भी माना जाता है कि काली मां की मूर्ति को विश्वामित्र ने ही प्रतिष्ठित कि...

Poornagiri Mata Shaktipeeth- पूर्णागिरी माता शक्तिपीठ

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अत्यंत चमत्कारी व सिद्ध है पूर्णागिरी माता का मंदिर. देवी शक्ति पीठ: जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां हुआ शक्तिपीठों का निर्माण - Story of Shaktipeeth  शक्ति पीठों के संबंध में मान्यता है कि जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां हुआ शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। दरअसल देवी पुराण के अनुसार एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया। माता सती को नारद से यह बात पता चली की उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है। उन्होंने शिवजी के मना करने पर भी जि़द की और अपने पिता के यहां यज्ञ में सम्मिलत होने के लिए हरिद्वार चली गई। वहां जाने पर जब उन्हें पता चला कि यज्ञ में शिवजी को छोड़कर सारे देवताओं को आमंत्रित किया गया है। तब उन्होंने अपने पिता से शिवजी को न बुलाने का कारण पूछा तो दक्ष ने शिवजी के बारे में अपमानजनक बातें कही। वे बातें माता सती से सहन नहीं हुई और उन्होंने अग्रिकुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहूति दे दी। जब ये समाचार शिवजी तक पहुंचा तो वे बहुत क्रोधित हुए उनका तीसरा नेत्र खुल गया। वीरभद्र ने उनके कहने ...

लंकापति श्री रावण द्वारा स्थापित शक्ति पीठ (Mansa Devi Shaktipeeth Ravan alias Badagaon near Barnawa in same district Baghpat.)

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माँ की शक्ति की स्थापना मां मनसा देवी मंदिर में लंकापति रावण द्वारा की गई थी। इस गांव की स्थापना रावण ने की थी। इसीलिए इस गांव का नाम रावण उर्फ ​​बड़ा गांव है। रावण के बसे हुए गाँव के कारण, इस गाँव में दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है। इतिहासकार भी मानते हैं कि महाभारत और रामायण काल ​​का संबंध बड़ा गांव से है। पुजारी श्री राम शंकर तिवारी के अनुसार, यह शक्ति, सिद्ध पीठ होने के नाते, सच्चे मन और निःस्वार्थ भावना से यहाँ मांगी गई इच्छाओं को अवश्य पूरा करती है। देवी सिद्ध पीठ के इरादे से नवरात्रि पर विशेष पूजा की जाती है। सिद्ध पीठ मंदिर में भगवान विष्णु की दशावतार प्रतिमा स्थापित है। इतिहासकार केके शर्मा का कहना है कि यहां की मूर्ति सातवीं शताब्दी की है। इसके अलावा, मंदिर में प्राचीन स्तंभ हैं, जिस पर मूर्ति अजंता अलोरा है। मंदिर पुरातत्व के लिहाज से भी बहुत महत्व रखता है। मंदिर का इतिहास: ऐसा माना जाता है कि रावण तपस्या करने के बाद हिमालय से लौट रहे थे। उनके साथ देवी शक्ति भी थीं। यह देवी शक्ति तपस्या से धन्य हुई और उन्हें वरदान मिला। वरदान देते समय शर्त यह थी कि रावण देवी की शक...