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12 Jyotirlingas of God Mahadev of Gods- देवो के देव महादेव जी के 12 ज्योतिर्लिंग

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सोमनाथ, प्रभास पाटन, सौराष्ट्र, गुजरात। सोमनाथ पहले पवित्र मंदिरों में से एक है और पारंपरिक रूप से, द्वादश ज्योतिर्लिंग तीर्थयात्रा सोमनाथ मंदिर से शुरू होती है। यह भगवान शिव का प्रमुख निवास स्थान है और सभी ज्योतिर्लिंगों में सबसे पवित्र माना जाता है। मंदिर को नष्ट कर दिया गया था और सोलह बार बनाया गया था, पूरे भारत में श्रद्धा में आयोजित किया जाता है और किंवदंती, परंपरा और इतिहास में समृद्ध है। यह गुजरात के सौराष्ट्र में प्रभास पाटन (सोमनाथ - वेरावल) में स्थित है। मल्लिकार्जुन, श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश। मल्लिकार्जुन, जिसे isrī ,aila भी कहा जाता है, कृष्णा नदी पर एक पर्वत पर स्थित है। आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में, एक प्राचीन काल में मल्लिकार्जुन को आश्रित किया गया है, जो प्राचीन रूप से andsculpturally समृद्ध है। यह एक जगह है जहाँ शक्तिपीता और ज्योतिर्लिंगम एक साथ हैं। आदि शंकराचार्य ने यहाँ अपने शिवानंद लाहिड़ी की रचना की। मध्य प्रदेश में महाकालेश्वर, उज्जैन, मध्य प्रदेश महाकाल, उज्जैन (या अवंती)। यह महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का घर है। माना जाता है कि महाकाल का लिंगम स्वयंवर है, ज...

Story of Ghritneshwar Jyotirlinga घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी

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इस ज्योतिर्लिंग के विषय में पुराणों में यह कथा वर्णित है- दक्षिण देश में देवगिरिपर्वत के निकट सुधर्मा नामक एक अत्यंत तेजस्वी तपोनिष्ट ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था दोनों में परस्पर बहुत प्रेम था। किसी प्रकार का कोई कष्ट उन्हें नहीं था। लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। ज्योतिष-गणना से पता चला कि सुदेहा के गर्भ से संतानोत्पत्ति हो ही नहीं सकती। सुदेहा संतान की बहुत ही इच्छुक थी। उसने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन से दूसरा विवाह करने का आग्रह किया। पहले तो सुधर्मा को यह बात नहीं जँची। लेकिन अंत में उन्हें पत्नी की जिद के आगे झुकना ही पड़ा। वे उसका आग्रह टाल नहीं पाए। वे अपनी पत्नी की छोटी बहन घुश्मा को ब्याह कर घर ले आए। घुश्मा अत्यंत विनीत और सदाचारिणी स्त्री थी। वह भगवान्‌ शिव की अनन्य भक्ता थी। प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर हृदय की सच्ची निष्ठा के साथ उनका पूजन करती थी। भगवान शिवजी की कृपा से थोड़े ही दिन बाद उसके गर्भ से अत्यंत सुंदर और स्वस्थ बालक ने जन्म लिया। बच्चे के जन्म से सुदेहा और घुश्मा दोनों के ही आनंद का पार न रहा। दोनों के दिन बड़े आराम से बीत रहे थे। ल...

Story of Rameshwaram Jyotirlinga रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग की कहानी (one of dham of char dham/चार धाम में से एक)

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रामेश्वरम् के विख्यात मंदिर की स्थापना के बारें में यह रोचक कहानी कही जाती है। सीताजी को छुड़ाने के लिए राम ने लंका पर चढ़ाई की थी। उन्होने लड़ाई के बिना सीताजी को छुड़वाने का बहुत प्रयत्न किया, पर जब राम सफलता न मिली तो विवश होकर उन्होने युद्ध किया। इस युद्ध में रावण और उसके सब साथी राक्षस मारे गये। रावण भी मारा गया; और अन्ततः सीताजी को मुक्त कराकर श्रीराम वापस लौटे। इस युद्ध हेतु राम को वानर सेना सहित सागर पार करना था, जो अत्यधिक कठिन कार्य था। रावण भी साधारण राक्षस नहीं था। वह पुलस्त्य महर्षि का नाती था। चारों वेदों का जाननेवाला था और था शिवजी का बड़ा भक्त। इस कारण राम को उसे मारने के बाद बड़ा खेद हुआ। ब्रह्मा-हत्या का पाप उन्हें लग गया। इस पाप को धोने के लिए उन्होने रामेश्वरम् में  शिवलिंग  की स्थापना करने का निश्चय किया। यह निश्चय करने के बाद श्रीराम ने हनुमान को आज्ञा दी कि काशी जाकर वहां से एक शिवलिंग ले आओ।  हनुमान  पवन-सुत थे। बड़े वेग से आकाश मार्ग से चल पड़े। लेकिन शिवलिंग की स्थापना की नियत घड़ी पास आ गई। हनुमान का कहीं पता न था। जब सीताजी ने देखा कि हनुम...

Ithihaas of nageshwar jyotilinga नागेश्वर ज्योतिलिंग का इतिहास

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सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था। वह भगवान्‌ शिव का अनन्य भक्त था। वह निरन्तर उनकी आराधना, पूजन और ध्यान में तल्लीन रहता था। अपने सारे कार्य वह भगवान्‌ शिव को अर्पित करके करता था। मन, वचन, कर्म से वह पूर्णतः शिवार्चन में ही तल्लीन रहता था। उसकी इस शिव भक्ति से दारुक नामक एक राक्षस बहुत क्रुद्व रहता था उसे भगवान्‌ शिव की यह पूजा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं लगती थी। वह निरन्तर इस बात का प्रयत्न किया करता था कि उस सुप्रिय की पूजा-अर्चना में विघ्न पहुँचे। एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने यह उपयुक्त अवसर देखकर नौका पर आक्रमण कर दिया। उसने नौका में सवार सभी यात्रियों को पकड़कर अपनी राजधानी में ले जाकर कैद कर लिया। सुप्रिय कारागार में भी अपने नित्यनियम के अनुसार भगवान्‌ शिव की पूजा-आराधना करने लगा। अन्य बंदी यात्रियों को भी वह शिव भक्ति की प्रेरणा देने लगा। दारुक ने जब अपने सेवकों से सुप्रिय के विषय में यह समाचार सुना तब वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस कारागर में आ पहुँचा। सुप्रिय उस समय भगवान्‌ शिव के चरणों में ध्यान लगाए हुए दोनों आँखें बं...

History of vaidyanath jyotirlinga वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास

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बैद्यनाथ धाम को बारहवां शिव ज्योतिर्लिंग भी कहते हैं, जो 51 शक्ति पीठों में प्रमुख है. यहां भगवान शिव की लिंग प्रतिष्ठित है. जुलाई-अगस्त (सावन के महीने में) भारत के विभिन्न स्थानों से 70 से 80 लाख श्रद्धालु सुल्तानगंज स्थित गंगा नदी से पवित्र जल ले कर 108 किमी के टेढ़े-मेढ़े रास्ते की पैदल यात्रा कर शिव जी पर अर्पित करते हैं. ‘शिव पुराण’ के अनुसार, बैद्यनाथ धाम के प्रतिष्ठित होने के पीछे भी लंबी कथा है. कहते हैं, एक बार रावण ने अपनी तपस्या से शिव जी को काफी प्रसन्न किया. खुश होकर शिव जी ने रावण से उसकी इच्छा पूछी तो रावण ने कहा कि मैं अपनी लंका नगरी में आपका शिवलिंग स्थापित करना चाहता हूं. शिव जी ने काफी सोच-विचार करने के बाद रावण की इच्छा को मानते हुए कहा कि मेरी एक ही शर्त है-रास्ते में उसे कहीं रखना मत, वरना मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा. रावण के शिवलिंग ले जाने की कोशिश से देवलोक में खलबली मच गई, तभी भगवान विष्णु ब्राह्मण का रूप धारण कर रावण के पास पहुंचे. रावण को अचानक लघुशंका लगी तो उसने जल्दी से ब्राह्मण को शिवलिंग सौंप दिया. मौका देखते ही ब्राह्मन रूपी भगवान विष्णु ने शिवलिंग को ज...

History of Trimbakeshwar jyotirlinga त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

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इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के विषय में शिवपुराण में यह कथा वर्णित है- एक बार महर्षि गौतम के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ किसी बात पर उनकी पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं। उन्होंने अपने पतियों को ऋषि गौतम का अपकार करने के लिए प्रेरित किया। उन ब्राह्मणों ने इसके निमित्त भगवान्‌ श्रीगणेशजी की आराधना की। उनकी आाधना से प्रसन्न हो गणेशजी ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा उन ब्राह्मणों ने कहा- 'प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो किसी प्रकार ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकाल दें।' उनकी यह बात सुनकर गणेशजी ने उन्हें ऐसा वर माँगने के लिए समझाया। किंतु वे अपने आग्रह पर अटल रहे। अंततः गणेशजी को विवश होकर उकी बात माननी पड़ी। अपने भक्तों का मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि गौतम के खेत में जाकर रहने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ऋषि बड़ी नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हाँकने के लिए लपके। उन तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं मरकर गिर पड़ी। अब तो बड़ा हाहाकार मचा। सारे ब्राह्मण एकत्र हो गो-हत्यारा कहकर ऋषि गौतम की भर्त्सना करने लगे। ऋषि गौतम इस घटना से बहुत आ...

History of Shri Kashi Vishweshwar Jyotirlinga श्री काशी विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

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स्कन्द पुराण के अनुसार स्कन्द पुराण  के इस आख्यान से स्पष्ट होता है कि श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या आदि से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहाँ निराकार परब्रह्म परमेश्वर महेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए। उन्होंने दूसरी बार महाविष्णु की तपस्या के फलस्वरूप प्रकृति और पुरुष (शक्ति और शिव) के रूप में उपस्थित होकर आदेश दिया। महाविष्णु के आग्रह पर ही भगवान शिव ने काशी क्षेत्र को अविमुक्त कर दिया। उनकी लीलाओं पर ध्यान देने से काशी के साथ उनकी अतिशय प्रियशीलता स्पष्ट मालूम होती है। इस प्रकार  द्वादश ज्योतिर्लिंग  में श्री विश्वेश्वर भगवान विश्वनाथ का शिवलिंग सर्वाधिक प्रभावशाली तथा अद्भुत शक्तिसम्पन्न लगता है। माँ अन्नापूर्णा (पार्वती) के साथ भगवान शिव अपने त्रिशूल पर काशी को धारण करते हैं और कल्प के प्रारम्भ में अर्थात सृष्टि रचना के प्रारम्भ में उसे त्रिशूल से पुन: भूतल पर उतार देते हैं। शिव महापुराण में श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा कुछ इस प्रकार बतायी गई है– 'परमेश्वर शिव ने माँ पार्वती के पूछने पर स्वयं अपने मुँह से श्री विश...

Story of Kedarnath Jyotirlinga केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी

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इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर  भगवान विष्णु  के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं। पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए  पांडव  काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर  पांडवों  को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल...