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Showing posts with the label Hindu Festival

गुड़ी पड़वा (Gudi Padwa)

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चैत्र   मास  की  शुक्ल   प्रतिपदा  को  गुड़ी पड़वा  या  वर्ष प्रतिपदा  या उगादि (युगादि) कहा जाता है। इस दिन  हिन्दु  नववर्ष का आरम्भ होता है। 'गुड़ी' का अर्थ 'विजय पताका' होता है। कहते हैं शालिवाहन नामक एक कुम्हार-पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से प्रभावी शत्रुओं का पराभव किया। इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की  संधि  से बना है ‘युगादि‘।  आंध्र प्रदेश  और  कर्नाटक  में ‘उगादि‘ और  महाराष्ट्र  में यह पर्व 'ग़ुड़ी पड़वा' के रूप में मनाया जाता है। परिचय कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है,...

संत झूलेलाल जी : हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के भगवान-संत झूलेलाल जी: हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के भगवान

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समूचे विश्व में फैले सिंधी समुदाय के लोग प्रतिवर्ष चैत्रमास की चन्द्रतिथि को अपने आराध्य देव संत झूलेलाल का जन्मोत्सव प्रेम-भाईचारे एवं राष्ट्रीय एकता के रूप में मनाते हैं। इस दिन को ‘सिंधी दिवस’ या ‘सिंधियत’ भी कहा जाता है। जलपति वरुणावतार भगवान झूलेलाल भगवान श्री कृष्ण के ही अवतार माने जाते हैं। संत झूलेलाल के संबंध में यह कहा जाता है कि लगभग 1040 वर्ष पूर्व सिंध (पाकिस्तान) में मुगल बादशाह मिरखशाह के अत्याचारों से जनता बेहद त्रस्त थी। बादशाह मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए जनता पर जुल्म ढाने लगा तो चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई और इस संकट की घड़ी में त्रस्त लोगों ने सिंधु नदी के तट पर वरुण देव की पूजा-अर्चना कर बादशाह के अत्याचारों से छुटकारा पाने की प्रार्थना की।     लगभग सात दिन तक लोगों ने ‘वरुण देव’ की पूजा की। तब अपने भक्तों की पुकार सुन वरुण देवता मछली पर सवार होकर संत ‘झूलेलाल’ के रूप में प्रकट हुए और कहा कि वह शीघ्र ही अत्याचारियों का नाश करने के लिए नसीरपुर शहर में रतन राय के घर जन्म लेंगे। कुछ समय बाद संत झूलेलाल ने माता देवकी की कोख से जन्म लिया और बालक का नाम घर वालों...

नरक चतुर्दशी कथा​ (काली चौदस)-Narak Chaturdashi story (Kali Chaudas)

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नरक चतुर्दशी कथा कार्तिक महीने में कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी को रूप चौदस, नरक चतुर्दशी कहते हैं। बंगाल में यह दिन मां काली के जन्म दिन के रूप में काली चौदस के तौर पर मनाते हैं। इसे छोटी दीपावली भी कहते हैं। इस दिन स्नानादि से निपट कर यमराज का तर्पण करके तीन अंजलि जल अर्पित किया जाता है। संध्या के समय दीपक जलाए जाते हैं। चौदस और अमावस्या तीनों दिन दीपक जलाने से यम यातना से मुक्ति मिलती है तथा लक्ष्मी जी का साथ बना रहता है। नरक चौदस की कहानी :- प्राचीन समय की बात है। रन्तिदेव नामक का एक राजा था। वह पहले जन्म में बहुत धर्मात्मा एवं दानी था। दूर-दूर तक उसकी बहुत ही ख्याति थी। अपने पूर्व जन्म के कर्मो की वजह से वह इस जन्म में भी अपार दान आदि देकर बहुत से सत्कार्य किए। दान धर्म करके सबका भला करता था। जरुरत मन्दो को कभी भी निराश नहीं होने देता था। कुछ समय पश्चात राजा बूढ़ा हो गया, उनके अंत समय में यमराज के दूत लेने आए। राजा को देखकर डराकर घूरते हुए कहा राजन ! राजन तुम्हारा समय समाप्त हो गया अब तुम नरक में चलो। तुम्हे वही चलना पड़ेगा। राजा ने सोचा भी नहीं था कि उसे नरक जाना पड़ेगा।  राजा ने घबरा...

Vishwakarma Puja-विश्वकर्मा पूजा

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भारत देश में अनेक हिन्दू धर्म के त्यौहार मनाये जाते है। उन्ही त्यौहार में से विश्वकर्मा पूजा भी एक बहुत प्रसिद्ध हिन्दू त्यौहार है। विश्वकर्मा पूजा हर साल 17 सितम्बर को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। कई जगह दिवाली से अगले दिन भी भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा की जाती है 11 सदी पुराना है ये मंदिर, मुरादों और रहस्य के लिए दुनिया झुकाती है शीश हमारे देश में रेल से लेकर सुई तक बड़े-बड़े इंजीनयर की सहायता से बनाये जाते है। तो क्या कभी सोचा है की ये जो ब्रह्माण्ड है उसे तो भी किसी ने बनाया ही होगा या किसी के द्वारा बनाया गया होंगा तो इसका जवाब हिन्दू धर्म में देवताओ के इंजीनयर यानि शिल्पकार देव भगवान विश्वकर्मा को माना जाता है। पुराणों के अनुसार सृस्टि की रचना आदिदेव ब्रह्मा जी को माना जाता है। विश्वकर्मा जी की सहायता से इस सृष्टि का निर्माण हुआ, इसी कारण इन्हें आज के समय में देवताओ का इंजीनियर भी कहा जाता है। जन्म की कथा:- हिन्दू धर्म शास्त्रो के अनुसार सबसे ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म के सातवे संतान जिनका नाम वास्तु था। विश्वकर्मा जी वास्तु के पुत्र थे जो अपने माता-पिता की भांति महान शिल्पकार हुए जि...

शीतला अष्टमी, बसौड़ा व्रत विधि और व्रत कथा (sheetala ashtami Basoda Vrat Katha & Vrat vidhi)

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शीतला अष्टमी  हिन्दुओं का एक त्योहार है जिसमें  शीतला माता  के व्रत और पूजन किये जाते हैं। ये होली सम्पन्न होने के अगले सप्ताह में बाद करते हैं। प्रायः शीतला देवी की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होती है, लेकिन कुछ स्थानों पर इनकी पूजा होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार के दिन ही की जाती है। भगवती शीतला की पूजा का विधान भी विशिष्ट होता है। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग यानि  बसौड़ा  तैयार कर लिया जाता है। अष्टमी के दिन बासी पदार्थ ही देवी को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता है और भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इस कारण से ही संपूर्ण उत्तर भारत में शीतलाष्टमी त्यौहार, बसौड़ा के नाम से विख्यात है।ऐसी मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी खाना खाना बंद कर दिया जाता है।[2] ये ऋतु का अंतिम दिन होता है जब बासी खाना खा सकते हैं। प्राचीनकाल से ही  शीतला माता  का बहुत अधिक माहात्म्य रहा है।  स्कंद पुराण  में शीतला देवी शीतला का वाहन  गर्दभ  बता...

Shani Dev Jayanti-शनि देव जयंती

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क्या महत्व है कैसे करें शनिदेव की पूजा जयंती माह की अमावस्या को शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन शनिदेव की पूजा करने से सभी शनि के कोप का भाजन बनने से बचा जा सकता है यदि पहले से ही कोई शनि के प्रकोप को झेल रहा है तो उसके लिए भी यह दिन बहुत ही कल्याणकारी हो सकता है। आइये जानते हैं कि शनिदेव की पूजा कैसे की जाती है और इसका क्या महत्व है? कौन हैं शनिदेव शनिदेव भगवान सूर्य और छाया (अगस्त) के पुत्र हैं। इन्हें क्रूर ग्रह माना जाता है जो कि इन पत्नी के शाप के कारण मिला है। शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण कृष्ण है और ये गिद्ध की सवारी करते हैं। फलित ज्योतिष के अनुसार शनि को अशुभ माना जाता है व 9 योजनाओं में शनि का स्थान सातवां है। ये एक राशि में तीस महीने तक रहते हैं और मकर और कुंभ राशि के स्वामी माने जाते हैं। शनि की महादशा 19 वर्ष तक रहती है। शनि की गुरू और शक्ति पृथ्वी से 95 वें गुणा ज्यादा मानी जाती है। माना जाता है इसी तरह गुरुत्व बल के कारण हमारे अच्छे और ब्योरे विचार चुंबकीय शक्ति से शनि के पास पंहुचते हैं जिनकी कृत्य अनुसार...

History of Lohri Festival-लोहड़ी महोत्सव का इतिहास

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लोहड़ी के पीछे की कहानी: लोहड़ी के त्योहार को मनाने के पीछे एक कहानी है। भगवद गीता के अनुसार, इस दिन, भगवान कृष्ण ने अपने वास्तविक अवतार में खुद को प्रकट किया था। एक ही दिन अलग-अलग त्योहार मनाए जाते हैं। कई लोग टीएन में लोहड़ी का त्योहार, आंध्र प्रदेश में भोगी, बिहार में मकर संक्रांति, असम में मकर संक्रांति और असम में बिहू के रूप में मनाते हैं। निष्कर्ष: लोहड़ी के त्यौहार के दौरान, लोग ठंड के मौसम का आनंद लेते हैं, और त्योहार को बहुत खुशी और उत्साह के साथ मनाते हैं। लोहड़ी त्योहार पर निबंध, लोहड़ी निबंध हिंदी में (700 शब्द) पंजाब के लोग हर साल 13 जनवरी को पूरे उत्साह के साथ लोहड़ी मनाते हैं। यह माना जाता है कि त्योहार उस दिन मनाया जाता है जब दिन छोटे होने लगते हैं और रातें देर हो जाती हैं। इस त्यौहार को फसल उत्सव के रूप में मनाया जाता है और इस दिन लोग दुलारी बत्ती का सम्मान करने के लिए अलाव जलाते हैं, गाते हैं और नृत्य करते हैं। हालाँकि यह पंजाबियों का एक प्रमुख त्योहार है, लेकिन भारत के कुछ उत्तरी राज्य भी इस त्योहार को मनाते हैं जिसमें हिमाचल प्रदेश और हरियाणा शामिल हैं। सिंधी समुदाय...

Story of goverment worship-गोवर्धन पूजा की कहानी

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गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन मनाई जाती है। गोवर्धन पूजा पंजाब, हरियाना, सम्राट प्रदेश और बिहार में काफी प्रसिद्ध है। परंपरा के अनुसार, गोवर्धन पर्वत को इस दिन विशेष रूप से गोबर से बनाया जाता है, जिसे गोवर्धन पर्वत के नाम से जाना जाता है। गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गोवर्धननाथ जी की प्रतिमा को गोबर के घरों में पूजा जाता है और अन्नकूट को भोजन अर्पित किया जाता है। यह परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। श्रीमद् भागवत में इसके बारे में कई स्थानों पर उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार, भगवान कृष्ण ने ब्रज में इंद्र की पूजा के स्थान पर कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू की थी। गोवर्धन पूजा का महत्व इस संबंध में एक लोकप्रिय किंवदंती है। कथा के समान भगवान कृष्ण ने इंद्र के अभिमान को तोड़ने के लिए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र के क्रोध से पूरे गोकुल निवासियों की रक्षा की थी। जब इंद्र के अभिमान को कुचल दिया गया, तो उन्होंने श्री कृष्णन से माफी मांगी। सात दिनों के बाद श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की स्थापना की और ब्रजवासियों को ...

Holy birth story of Shri Ram-श्रीराम जी की पवित्र जन्म कथा

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रामायण और रामचरित मानस हमारे पवित्र ग्रंथ हैं। तुलसीदास जी ने श्री राम को भगवान मानकर रामचरितमानस लिखा है लेकिन आदिकवि वाल्मीकि ने अपनी रामायण में श्री राम को एक इंसान माना है। राम के राज्याभिषेक के बाद तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को समाप्त कर दिया है, जबकि आदिकवि श्री वाल्मीकि ने अपने रामायण में श्री राम के महाप्रयाण तक की कहानी सुनाई है। महाराज दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ शुरू करने का निर्णय लिया। महाराज के ज्ञान के अनुसार श्यामकर्ण घोड़े को चतुरंगिणी सेना के साथ बचाया गया था। महाराज दशरथ ने यज्ञ करने के लिए सभी धर्मपरायण, तपस्वी, विद्वान ऋषियों और वेद विज्ञान प्रमुख पवन पंडितों को बुलावा भेजा। अपेक्षित समय पर, महाराज दशरथ सभी भक्तों के साथ अपने गुरु वशिष्ठ और उनके परम मित्र अंग, देश के स्वामी, राम, लोभपाद के पुत्र, राम राम के साथ यज्ञ मंडप में उपस्थित हुए। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत उद्घाटन किया गया। संपूर्ण वातावरण वेदों के उच्च स्वर में पाठ के साथ प्रतिध्वनित होता है, और समिधा की खुशबू से महक उठता है। यज्ञ सभी पंडितों, ब्राह्मणों, ऋषियों इत्यादि को अच्छे धन के साथ समाप्त ...

Bho-Bija / Bhai Tika / Bhai Fota / Bhai Dooj भो-बीजा / भाई टीका / भाई फोटा / भाई दूज

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भाई दूज की लोक कथा एक बुढ़िया थी| उसके सात बेटे और एक बेटी थी| बेटी की शादी हो चुकी थी| जब भी उसके बेटे की शादी होती, फेरों के समय एक नाग आता  और उसके बेटे को डस लेता था| बेटा वही खत्म हो जाता और बहू विधवा| इस तरह उसके छह बेटे मर गये | सातवे की शादी होनी बाकी थी| इस तरह अपने  बेटों के मर जाने के दुख से बुढ़िया रो रो के अंधी हो गयी थी| भाई दूज आने को हुई तो भाई ने कहा की मैं बहिन से तिलक कराने जाऊँगा| माँ ने कहा ठीक है| उधर  जब बहिन को पता चला की उसका भाई आ रहा है तो वह खुशी से पागल होकर पड़ोसन के गयी और पूछने लगी की जब बहुत प्यारा भाई घर आए तो क्या बनाना चलिए? पड़ोसन उसकी खुशी को देख कर जलभुन गयी और कह दिया कि,” दूध से रसोई लेप, घी में चावल  पका| ” बहिन ने ऐसा  ही किया| उधर भाई जब बहिन के घर जा रहा था तो उसे रास्ते में साँप मिला| साँप उसे डसने को हुआ| भाई बोला- तुम मुझे क्यू डस रहे हो? साँप बोला- मैं तुम्हारा काल हूँ| और मुझे तुमको डसना है| भाई बोला- मेरी बहिन मेरा इंतजार कर रही है| मैं जब तिलक करा के वापस लौटूँगा, तब तुम मुझे डस लेना| साँप ने कहा- भला आज तक कोई...