क्या है शिव मंदिर में कछुए की प्रतिमा का महत्व?-What is the significance of turtle statue in Shiva temple?



शिव मंदिर में शिवलिंग सहित हर देव मूर्ति या चिन्ह जीवन से जुड़े कुछ न कुछ संकेत जरूर देते हैं। बस जरूरत है इन देव मूर्तियों में छुपे संकेतों को समझने और शिवालय से लौटने पर भी उनको अपना मार्गदर्शक बनाने की, जिससे देव दर्शन सार्थक बन जाए। शिवालय में जाने पर मूर्तियों के क्रम में नंदी के बाद हम कछुए की मूर्ति के दर्शन करते हैं। यह कछुआ शिव की ओर बढ़ रहा होता है, न कि नंदी की ओर। यह कछुआ शिव की ओर ही क्यों सरकता है? जानिए इसमें छिपे संदेशों को- 
जिस तरह नंदी हमारे शरीर को परोपकार, संयम और धर्म आचरण के लिए प्रेरित करने वाला माना गया है। ठीक उसी तरह शिव मंदिर में कछुआ मन को संयम, संतुलन और सही दिशा में गति सिखाने वाला माना गया है। कछुए के कवच की तरह हमारे मन को भी हमेशा शुद्ध और पवित्र कार्य करने के लिए ही मजबूत यानि दृढ़ संकल्पित बनाना चाहिए। मन को कर्म से दूर कर मारना नहीं, बल्कि हमेशा अच्छे कार्य करने के लिए जगाना चाहिए। खासतौर पर स्वार्थ से दूर होकर दूसरों की भलाई, दु:ख और पीड़ा को दूर करने के लिए तत्पर रखना चाहिए यानि मन की गति बनाए रखना जरूरी है। सरल शब्दों में मन स्वार्थ और शारीरिक सुखों के विचारों में न डूबा रहे, बल्कि मन को साधने के लिए दूसरों के लिए भावना, संवेदना रखकर कल्याण के भाव रखना भी जरूरी है। यही कारण है कि कछुआ मंगलकारी देव शिव की ओर जाता है, न कि नंदी की ओर, जो शरीर के द्वारा आत्म सुख की ओर जाने का प्रतीक है। आसान शब्दों में अर्थ है नंदी शारीरिक कर्म का और कछुआ मानसिक चिंतन का प्रेरक है।इसलिए अध्यात्म का आनंद पाने के लिए मानसिक चिंतन को सही दिशा देना चाहिए और यह करने के लिए धर्म, अध्यात्म और शिव भक्ति से जुड़ें।

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